गुरूगीता के प्रत्येक महामंत्र में अपरिमित आध्यात्मिक ऊर्जा समायी है। वे धन्य हैं, अति बड़भागी हैं, जो इनका गायन करते हैं, जिनका मन इन महामंत्रों की साधना करने में अनुरक्त हुआ है; क्योंकि ऐसे अपूर्व साधकों को सहज ही सद्गुरू प्रेम की उपलब्धि होगी और यह सद्गुरू प्रेम अध्यात्म जगत् का परम दुर्लभ तत्त्व है। जिसके हृदय में निष्कपट सद्गुरू प्रेम है, उसे सब कुछ अपने आप ही सुलभ हो जाता है। उसे किसी भी अन्य साधन एवं साधना की जरूरत नहीं रहती, समस्त साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरू ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विध्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है- साधन गुरूवर पद नेहू्। 
     गुरूनेह की भावकथा में रमे हुए शिष्यों ने इस गुरू प्रेम कथा के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन वचनों को पढ़ा है कि गुरूदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतु बन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। गुरूदेव की उपासना करने में तल्लीन रहना प्रत्येक शिष्य का कर्तृत्व है; क्योंकि उनके अनुग्रह से महान् अज्ञान का नाश होता है। गुरूदेव भगवान् सभी तरह की अभीष्ट सिद्धि देने वाले हैं; उन्हें नमन करना शिष्यों का परम धर्म है। इसका थोड़ा सा भी पालन संसार के महाभय से त्राण करने वाला है। सभी तरह की पीड़ायें गुरू कृपा से स्वयं ही शान्त हो जाती हैं। 
     गुरू प्रेम की इस साधना महिमा के अगले क्रम को प्रकट करते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगन्माता भवानी से कहते हैं- 
 
पादाब्जं सर्वसंसार दावानल विनाशकम्। 
ब्रह्मरन्ध्रे सिताम्भोजमध्यस्थं चन्द्रमण्डले॥ ५७॥ 
अकथादित्रिरेखाब्जे सहस्त्रदलमण्डले। 
हंसपार्श्वत्रिकोणे च स्मरेत्तन्मध्यगं गुरूम्॥ ५८॥ 
 
     गुरूदेव की करूणा की व्याख्या करने वाले इन महामंत्रों में साधन के गहरे रहस्य सँजोये हैं। इन रहस्यों को गुरूभक्त साधकों के अन्तःकरण में सम्प्रेषित करते हुए भगवान् भोलेनाथ के वचन हैं- गुरूदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरूभक्त साधकों को उन सद्गुरू का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए॥५७॥ यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल के बीच में सहस्त्रदलमण्डल पर अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए॥ ५८॥ 
     सद्गुरू के ध्यान की यह सर्वोच्च विधि है। यह ध्यान जीवन को शिवस्वरूप प्रदान करने वाला है। अत्यन्त प्रभावशाली एवं परम गोपनीय अतिदुर्लभ एवं समस्त आध्यात्मिक विभूतियों को प्रकट करने वाला है। ध्यान की इस रहस्यमयी विधि का प्रयोग श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के शिष्य दुर्गाचरण नाग का नाम अपरिचित नहीं है। श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में उन्हें नाग महाशय के नाम से जाना जाता था। गृहस्थ होने के बावजूद उनका जीवन संन्यासियों से भी ज्यादा कठोर एवं तपपरायण था। उनके कठोर तपश्चरण के अनेकों कथानक सन्त साहित्य में पढ़े और जाने जाते हैं। 
     नाग महाशय का सारा दिन गरीबों एवं दुःखी जनों की चिकित्सा सेवा में बीतता था। चिकित्सक होते हुए भी उनके लिए चिकित्सा कभी भी व्यवसाय नहीं बनी, बल्कि उन्होंने सदा ही उसे सेवा कार्य समझा। अपने इस सेवा कार्य में, जिसे वे नारायण सेवा कहा करते थे, कभी- कभी तो घर का सामान और रूपये भी दे आते थे। दिन भर की इस सेवा के बावजूद नाग महाशय की प्रायः सम्पूर्ण रूचि जप- ध्यान में बीतती थी। उनकी साधना इतनी उग्र एवं कठोर थी कि सामान्य निद्रा की उन्हें कोई विशेष जरूरत नहीं रह गयी थी। अमावस के दिन उपवास रखकर गंगा के किनारे जप करते- करते वह भाव समाधि में लीन हो जाते थे। कभी- कभी तो यह समाधि दशा इतनी प्रगाढ़ होती कि नदी का ज्वार उन्हें बहा ले जाता। बाद में इन्हें तैरकर वापस आना पड़ता। 
      ऐसे महान् साधक नाग महाशय के लिए उनके गुरू श्रीरामकृष्ण ही सर्वस्व थे। साधना के उच्च शिखरों पर आरूढ़ नाग महाशय की पात्रता- पवित्रता एवं साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्त्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्रीरामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था- तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया- यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा- तब ठीक है। तुम सच्चे अधिकारी हो। तुम इसे कर सकते हो। ऐसा कहते हुए श्री ठाकुर को समाधि लग गयी। समाधि की इसी भावदशा में नाग महाशय को एक दिव्य अनुभूति हुई, जिसमें उनके पैर पड़ गये। इस स्पर्श मात्र से नाग महाशय को एक दिव्य अनुभूति हुई, जिसमें उनके अन्तःकरण में सहस्त्रदल कमल में सद्गुरू के ध्यान का स्वरूप प्रकट हो गया। साथ ही उन्हें सर्वत्र दिव्य ज्योति के दर्शन भी हुए। 
     इस अनुभूति के बाद उन्होंने श्री ठाकुर द्वारा निर्दिष्ट की गयी ध्यान की विधि का प्रयोग करना शुरू किया। यहाँ पर हम इन पंक्तियों के पाठकों को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सहस्त्रदल कमल में ध्यान की यह विधि सर्वसाधारण के लिए उचित नहीं है। जिसके आज्ञाचक्र एवं अनाहत चक्र का ठीक- ठीक विकास हो चुका होता है, उन्हीं के लिए यह दुर्लभ साधना उचित बतायी गयी है। सहस्त्रदल कमल पर गुरूगीता के इन महामंत्रों के अनुरूप ध्यान की परमहंस अवस्था को सिद्धों का ध्यान कहा गया है। यही कारण है कि यहाँ उसका सम्पूर्ण रहस्य नहीं बताया जा रहा ।। नाग महाशय की उच्च अवस्था देखकर ही श्री श्रीरामकृष्ण ने उन्हें यह दुर्लभ प्रयोग बताया था। 
इस ध्यान प्रयोग से नाग महाशय में असीमित योग ऐश्वर्य प्रकट हुआ। उन्होंने अपने गुरूदेव के साकार और निराकार स्वरूप के दर्शन किये। माँ गंगा स्वयं ही उनके आँगन में प्रकट हुआ। संक्षेप में इस ध्यान विधि से परम असम्भव भी सम्भव बन पड़ता है। हाँ, इसे निर्दिष्ट करने का अधिकार केवल सद्गुरू को है। जिन्हें भी यह विधि गुरूदेव ने बतायी है, वे आज आध्यात्मिक जीवन के परम आनन्द में विभोर हैं। गुरूदेव की कृपादृष्टि ऐसी ही सर्वफलदायिनी है।