गुरूगीता शिष्यों के लिए आध्यात्मिक कल्पतरू है, जो शिष्य इसके मंत्रों के मर्म को जान लेते हैं, उन्हें जीवन की सभी आध्यात्मिक सफलताएँ मिलती हैं। इस सत्य को वे सभी अपनी अनुभूति बना सकते हैं, जिनके अन्तस् में शिष्यत्व की सजल संवेदना प्रवाहित है। शिष्यत्व उर्वर कृषि भूमि है और आध्यात्मिकता बीज। जिसे कृपालु सद्गुरू न केवल अपने शिष्यों के अन्तःकरण में बीते हैं, बल्कि इसके अंकुरण के लिए उपयोगी खाद- पानी भी जुटाते हैं। सद्गुरू तो सदा होते ही हैं- भाव संवेदनाओं की साकार मूर्ति। उन्हें तो हमेशा कृपा करना आता है। पर इसके लिए सत्पात्र भी तो हो। सुशिष्य ही सत्पात्र होते हैं। उनकी अन्तर्भूमि ही आघ्यात्मिक बीजों के लिए उर्वर व उपयोगी होती है। यह उपयोगिता व उत्कृष्टता तब और सघन हो जाती है, जब उन्हें गुरूगीता की सघन आध्यात्मिक छाँव प्राप्त हो। 
     पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् भोलेनाथ ने शिष्यों को चेताया है कि वे कभी भी किसी भी अवस्था में सद्गुरू की अवहेलना न करें। परिस्थितियाँ कुछ भी हों पर वे अपने सद्गुरू के प्रति न के वल शिष्ट, शालीन व विनम्र रहें, बल्कि भक्तिपूर्ण भी हों। गुरूदेव के हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है। फिर यह कार्य ऊपरी तौर पर देखने से कितना ही निरर्थक क्यों न लग रहा हो। गुरू की अवहेलना करने वाला बुद्धिमान होने पर भी ब्रह्म राक्षस की तरह अभिशप्त हो जाता है। विश्व की सभी आध्यात्मिक शक्तियों के रूष्ट होने पर सद्गुरू त्राण कर लेते हैं, परन्तु गुरूदेव के रूष्ट होने पर कोई त्राणदाता नहीं मिलता। 
 
भगवान् महेश्वर इस कथा के अगले प्रकरण में कहते हैं- 
 
मंत्रराजमिदं देवि गुरूरित्यक्षरद्वयम् ।। 
स्मृतिवेदार्थवाक्येन गुरूः साक्षात्परं पदम्॥ १०७॥ 
श्रुतिस्मृती अविज्ञाय केवलं गुरूसेवकाः। 
ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः॥ १०८॥ 
नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम् ।। 
सर्व ब्रह्म निराभासं दीपो दीपान्तरं यथा॥ १०९॥ 
गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामं निरीक्षयेत्। 
अनेन गुरूमार्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्त्तते॥ ११०॥ 
     गुरू ये दो अक्षर अपने में महामंत्र है। यह महामंत्र सभी मंत्रों का राजा है। सभी स्मृतियों एवं वेदवाक्यों का मर्म यही है कि गुरू ही स्वयं परमपद है॥ १०७॥ जो शिष्य अपने गुरूदेव की सेवा में तल्लीन है, वे भले ही श्रुतियों व स्मृतियों को न जानते हों, पर वे हैं सच्चे संन्यासी। इसके विपरीत जो गुरूदेव से विमुख हैं, वे भले ही संन्यासी का वेष धारण किये हों, पर केवल निरवेषधारी हैं। उनमें कोई आध्यात्मिक तत्त्व नहीं है॥ १०८॥ नित्य निराकार, निर्गुण ब्रह्म का बोध के वल गुरू कृपा से मिलता है। जिस तरह दीप से दीप जलता है, उसी तरह से गुरूदेव शिष्य के अन्तस् में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं॥१०९॥ शिष्य को चाहिए कि वह अपनी सद्गुरू कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते रहने पर गुरूदेव के द्वारा दिखाए मार्ग से स्वतः आत्मज्ञान हो जायेगा॥११०॥ 
       भगवान शूलपाणि के इन बोध वचनों में ऐसा अलौकिक प्रकाश है, जो शिष्यों के आध्यात्मिक पथ को प्रशस्त कर देता है। शिष्य के लिए गुरूसेवा साधना है। गुरू सेवा का अर्थ है- गुरूदेव जो भी कहें, जैसा भी काम सौपें- वैसा ही करना। कई बार गुरूदेव द्वारा कहे गये कार्य को बड़ी सांसारिक, लौकिक एवं सामाजिक रीति से आँकते हैं और ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि गुरूदेव तो संसार की सभी बातों से परे हैं, फिर भला वे सांसारिक कैसे हो सकते हैं? वे यदि शिष्य को काँटों भरी डगर से गुजारते हैं, तो केवल इसलिए कि इससे उसका कल्याण होगा। उनके द्वारा दिये गये प्रत्येक कष्ट में भविष्य के अनेकों सुखद् अहसास समाये होते हैं। पर इसे केवल वही समझ पाता, जिसका हृदय भक्ति की भावनाओं से भरा है। ऐसी भावनाएँ जिसकी चेतना में अंकुरित हैं- वह जानता है, गुरूदेव तो केवल अपनी ज्ञान ज्योति से शिष्य में ब्रह्मज्ञान की परम ज्योति जला रहे हैं। 
      इस सम्बन्ध में बड़ी प्यारी अनुभूति कथा है। यह कथा एक ऐसे शिष्य की है, जिसके मन में तो उज्ज्वल विचार थे, पर जिसके संस्कार बड़े दूषित थे। जो अनचाहे व अनजाने अनेकों वासनाओं से घिर जाता है। अनेकों प्रयत्नों के बावजूद जिसकी काम वासना शान्त न होती थी। बड़ी दुःखद स्थिति थी उसकी। इस गहरी पीड़ा में उसका कोई साझीदार न था। उसकी कामवासना की परिणति सदा अवसाद में होती है, पर करे भी तो क्या? कोई रास्ता भी तो न था। कामवासना की भीषणता में ध्यान, जप एवं उपवास के सारे प्रयोग निरर्थक चले जाते। अपने आन्तरिक द्वन्द्व व संघर्ष की इसी घड़ी में गुरू ने अपने शिष्य को अपना लिया और शिष्य ने अपने उद्धारक सद्गुरू को पहचान लिया। 
      विकल वासनाओं से घिरे शिष्य की यही एक चाहत थी कि उसकी वासनाएँ गिरें, उसका चित्त निर्मल हो। गुरूदेव ने उसे आश्वसन भी दिया और कहा कि वह अपने को आश्रम की साफ- सफाई में लगा दें। ऊपर से साधारण दिखने वाले इस काम में शिष्य ने अपने को झोंक दिया। रात- दिन उसका एक ही काम था- जो कहा गया, उसे करना। अपमान तिरस्कारों की झड़ी, शारीरिक व मानसिक परेशानियाँ उसे डिगा न सकीं। गुरूदेव को दिया गया वचन ही उसका जीवन था। ऐसा करते हुए उसकी किशोरावस्था कब प्रौढ़ावस्था में बदल गयी, पता नहीं चला। हालाँकि उसे अपने जीवन के इस तरह बीत जाने का कोई दुःख न था, परन्तु एक पीड़ा अवश्य उसके मन में पलती थी। एक वेदना से अवश्य उसका मन विकल होता था और वह वेदना थी- वासनाओं के आकर्षण की। अभी तक उसका मन पूर्ण निर्मल न हो पाया था। 
      अपनी इस वेदना को अपने अकेलेपन में जीता हुआ वह गुरू आज्ञा का पालन किये जा रहा था, पर कहीं गहरे छूपे दुःख में वह लिपटा हुआ था। बार- बार उसका आर्त स्वर बाबा सर्वानन्द को पुकार लेता, जो अब अपनी स्थूल देह में नहीं थे। अरे! यह क्या हुआ बाबा? मेरा अन्तस् इतना कलुषित क्यों है? पुकार के स्वर निरन्तर गहरे- घने होते गये। पीड़ा बढ़ती गयी। यह सघन पीड़ा ही उसकी प्रार्थना बन गयी। अपने शिष्य की इस असह्य वेदना को भला कृपालु सद्गुरू कब तक सहन करते। एक दिन वह उसके ध्यान में प्रकट हो गये। बेचारा शिष्य बिलख- बिलख कर रो पड़ा। उसके अन्तस् से यही भाव फूटे- गुरूदेव! आपने जैसा कहा- मैंने वहीं किया। फिर भी मेरी यह दुर्दशा क्यों है? 
      उसकी भाव चेतना में उपस्थित बाबा सर्वानन्द की सूक्ष्म चेतना स्पन्दित हुई। वत्स! हम तुम्हारी पीड़ाओं से परिचित हैं। यह सच है कि तुम अभी पूर्ण परिष्कृत नहीं हो पाये हो; परन्तु अपने परिष्कार की राह पर गतिशील हो। तुम्हारे इस वर्तमान जीवन और शरीर की कुछ सीमाएँ हैं। तुम्हें यह जीवन एवं शरीर तुम्हारे विगत दुष्कर्मों के प्राययिश्चत के लिए मिला है और वही हो रहा है। प्रत्येक घड़ी- प्रत्येक पल में विभिन्न परिस्थितियों के द्वारा तुम्हारे चित्त को निर्मल बना रहा हूँ। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर भी जाग्रत् होकर परिपक्व होने की दशा में है। इसके सम्पूर्ण विकास के साथ ही तुम्हारी स्थूल देह नष्ट हो जायेगी, क्योंकि इस देह से उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं का क्रम तुम अपनी सूक्ष्म चेतना द्वारा पूरा करोगे। अगले जीवन में इसमें और भी विकास होगा। बाबा सर्वानन्द की इन बातों ने शिष्य को यह अनुभव करा दिया कि कृपालु गुरूदेव सदा अपने शिष्य का ध्यान रखते हैं। बस शिष्य उन्हें अपने भावों मे अनुभव करता रहे।