अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान विज्ञान भाग ४ | Anjarjagat Ki Yatra Ka Gyan Vigyan Bhag 4 Book in Hindi

अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान विज्ञान भाग ४ | Anjarjagat Ki Yatra Ka Gyan Vigyan Bhag 4 Book in Hindi

Product Code: HIN1174H_SA_40
Author Name : Dr. Pranav Pandya
Publication : Shantikunj, Haridwar
Totap Pages : 144 Pages_Regular Size Book
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Table Of Content  
1.  पाँच प्रकार की होती है सिद्धियाँ पृष्ठ: 9
2.  चित्त में परिवर्तन से बदलते है घटनाक्रम पृष्ठ: 13
3.  प्रकृति स्वंय पूरा करती है अपना लक्ष्य पृष्ठ: 17
4.  निर्माण चित्त से सम्भव है अनेक देह पृष्ठ: 21
5.  अनेक चित्त का निर्माण व नियंत्रण कर सकता है-योगी पृष्ठ: 25
6.  ध्यान से होती है सम्पूर्ण चित्त शुद्धि पृष्ठ: 29
7.  कर्मों की गति से पार है योगी पृष्ठ: 33
8.  गहरे हैं कर्म के रहस्य पृष्ठ: 37
9.  संस्कारों के अनुरुप घटता है-कर्मफल भोग पृष्ठ: 41
10.  अनादि है वासनाएँ पृष्ठ: 45
11.  जानें वासना के कारणों को पृष्ठ: 49
12.  वासना कभी नष्ट नहीं होती पृष्ठ: 53
13.  पल-पल रुप बदलती है वासनाएँ पृष्ठ: 57
14.  वासना से उत्पन्न होती है अनन्त अनुभूतियाँ पृष्ठ: 61
15.  चित्त परिवर्तन से बदलती है अनुभूतियाँ पृष्ठ: 65
16.  प्रकृति से भिन्न है चित्त का अस्तित्त्व पृष्ठ: 69
17.  चित्त में समाहित मनोविज्ञान  पृष्ठ: 73
18.  चित्त का स्वामी व ज्ञाता है पुरुष पृष्ठ: 77
19.  स्वप्रकाशित नहीं है चित्त पृष्ठ: 81
20.  एक समय में एक ही ज्ञान प्रकट होता है चित्त में  पृष्ठ: 85
21.  सम्भव है चित्त से चित्त का ज्ञान पृष्ठ: 89
22.  चित्त नहीं चेतन पुरुष है हमारा स्वरुप पृष्ठ: 93
23.  जीवन के सब अर्थ समाये हैं चित्त में  पृष्ठ: 97
24.  असंख्य वासनाओं का घर है चित्त पृष्ठ: 101
25.  आत्मभावना द्वार है अध्यात्म का पृष्ठ: 105
26.  विवेकज्ञान के उदय से प्राप्त होता है कैवल्य पृष्ठ: 109
27.  निर्लिप्त होता है योगी का जीवन पृष्ठ: 113
28.  विवेकज्ञान से सम्भव है संस्कारों का विनाश पृष्ठ: 117
29.  विवेक-वैराग्य का शिखर है-धर्ममेघ समाधि पृष्ठ: 121
30.  क्लेश-कर्म से रहित होता है- जीवनमुक्त्त योगी पृष्ठ: 125
31.  आवरण के हटते ही होता है- असीम ज्ञान पृष्ठ: 129
32.  कृतार्थ हो जाता है योगी का जीवन पृष्ठ: 133
33.  कैवल्य में थम जाता है- नये जीवन का क्रम पृष्ठ: 137
34.  स्वयं के स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाना है- कैवल्य पृष्ठ: 141
35.  उपसंहार पृष्ठ: 144


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