ईश्वर और उसकी अनुभूति | Ishavar Aur Usaki Anubhooti Book in Hindi

ईश्वर और उसकी अनुभूति | Ishavar Aur Usaki Anubhooti Book in Hindi

Product Code: HIN0019H_AA_19
Author Name : Pt. Shriram Sharma Acharya
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 168 Pages_Regular Size Book
Download : 586
Availability: 4

ईश्वर और उसकी अनुभूति pdf book free download

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Table Of Content
1.  मानव जीवन और ईश्वर विश्वास पृष्ठ: 5
2.  हम महान ईश्वर के महान पुत्र हैं पृष्ठ: 9
3.  ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है पृष्ठ: 15
4.  ईश्वर है या नहीं? पृष्ठ: 20
5.  ईश्वर और उसकी अनुभूति पृष्ठ: 25
6.  सर्वशक्तिमान परमेश्वर और उसका सान्निध्य पृष्ठ: 29
7.  परमात्मा की अनन्द अनुकम्पा और उसके दर्शन पृष्ठ: 35
8.  हम ईश्वर से विमुख न हों पृष्ठ: 39
9.  निर्भयता का वरदान पृष्ठ: 41
10.  न उपेक्षा करें और न विमुख हों पृष्ठ: 42
11.  परमात्मा का दर्शन कैसे मिले? पृष्ठ: 43
12.  ईश्वरोपासना के सत्परिणाम पृष्ठ: 47
13.  ईश्वर उपासना से महान आध्यात्मिक लाभ पृष्ठ: 51
14.  जीवन को भव्य बनाने वाली ब्रह्मविद्या पृष्ठ: 57
15.  भगवान आपके अन्दर सोया है, उसे जगाइए पृष्ठ: 62
16.  परमेश्वर के साथ अनन्य एकता का मार्ग पृष्ठ: 67
17.  परमात्मसत्ता से सम्बद्ध होने का माध्यम पृष्ठ: 73
18.  उपासना आवश्यक है और अनिवार्य भी पृष्ठ: 79
19.  ईश्वर उपासना आवश्यक क्यों ? पृष्ठ: 85
20.  उपासना अर्थात़् परमात्मा की समीपता पृष्ठ: 89
21.  उपासना का उद्देश्य-आत्मशान्ति पृष्ठ: 94
22.  उपासना के साथ कामनायें न जोड़ें पृष्ठ: 100
23.  उपासना फलवती कैसे हो ? पृष्ठ: 105
24.  उपासना-अन्त:करण की गहराई से पृष्ठ: 109
25.  सच्ची उपासना का स्वरुप पृष्ठ: 113
26.  परमात्मा का सान्निध्य और सम्पर्क साधें पृष्ठ: 117
27.  प्रार्थना द्धारा अपने को परमात्मा से मिलाइये पृष्ठ: 122
28.  उपासना बिना कल्याण नहीं पृष्ठ: 127
29.  उपासना ही नहीं-साधना भी पृष्ठ: 132
30.  हमारा समस्त जीवन ही साधनामय बने पृष्ठ: 134
31.  साधना आवश्यक है और अनिवार्य भी पृष्ठ: 141
32.  साधना ही महानता पृष्ठ: 148
33.  तपसाधना की आवश्यकता पृष्ठ: 155
34.  आत्म साधना के कठिन पथ पर पृष्ठ: 159
35.  ईश्वर प्राप्ति की साधना पृष्ठ: 163
36.  सारा जीवन ही साधना बने पृष्ठ: 167

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महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में कुछ दिन ही शेष थे ।। कौरव और पाण्डव दोनों पक्ष अपनी- अपनी तैयारियाँ कर रहे थे युद्ध के लिए ।। अपने- अपने पक्ष के राजाओं को निमंत्रित कर रहे थे ।। भगवान् श्रीकृष्ण को निमन्त्रित करने के लिए अर्जुन और दुर्योधन एक साथ पहुँचे ।। भगवान् ने दोनों के समक्ष अपना चुनाव प्रश्र रखा ।। एक ओर अकेले शस्त्रहीन श्रीकृष्ण और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की सारी सशस्त्र सेना इन दोनों में से जिसे जो चाहिए वह माँग ले ।। दुर्योधन ने सारी सेना के समक्ष निरस्त कृष्ण को अस्वीकार कर दिया; किन्तु अपने पक्ष में अकेले निरस्त भगवान् कृष्ण को देखकर अर्जुन मन- ही बड़ा प्रसन्न हुआ ।। अर्जुन ने भगवान् को अपना सारथी बनाया ।। भीषण संग्राम हुआ ।। अन्तत: पांडव जीते और कौरव हार गये ।। इतिहास साक्षी है कि बिना लड़े भगवान् कृष्ण ने अर्जुन का सारथी मात्र बनकर पाण्डवों को जिता दिया और शक्तिशाली सेना प्राप्त करके भी कौरव को हारना पड़ा ।। दुर्योधन ने भूल की जो स्वयं भगवान् के समक्ष सेना को ही महत्त्वपूर्ण समझा और सैन्य बल के समक्ष भगवान् को ठुकरा दिया ।। 

किन्तु आज भी हम सब दुर्योधन बने हुए हैं और निरन्तर यही भूल करते जा रहे हैं ।। संसारी शक्तियों, भौतिक सम्पदाओं के बल पर ही जीवन संग्राम में विजय चाहते हैं, ईश्वर की उपेक्षा करके, हम भी तो भगवान् और उनकी भौतिक स्थूल शक्ति दोनों में से दुर्योधन की तरह स्वयं ईश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं और जीवन में संसारी शक्तियों को प्रधानता दे रहे हैं; किन्तु इससे तो कौरवों की तरह असफलता ही मिलेगी ।।

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