अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान विज्ञान भाग १ | Antarjagat Ki Yatra Ka Gyan Vigyan Bhag 1 Book in Hindi

अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान विज्ञान भाग १ | Antarjagat Ki Yatra Ka Gyan Vigyan Bhag 1 Book in Hindi

Product Code: HIN0635H_SA_27
Author Name : Dr. Pranav Pandya
Publication : Shantikunj, Haridwar
Totap Pages : 200 Pages_Regular Size Book
Download : 1122
Availability: 3

अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान भाग -१ pdf book free download

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Table Of Content  
1.  अपनी बात आपसे पृष्ठ: 5
2.  प्रवेश से पहले जानें अथ का अर्थ पृष्ठ: 9

3.  मन मिटे,तो मिल-चित्तवृति योग का सत्य पृष्ठ: 17
4.  क्या होगा मंजिल पर? पृष्ठ: 23  
5.  सावधान ! बड़ा बेबस बना सकता है मन पृष्ठ: 27
6.  अनूठी हैं-मन की पाँचों वृतियाँ पृष्ठ: 31
7.  जीवन कमल खिला सकती हैं-पंच वृतियाँ पृष्ठ: 35
8.  आखिर कैसे मिले सम्यक ज्ञान पृष्ठ: 40
9.  जानें, किस भ्रम में हैं हम पृष्ठ: 45
10.  कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार पृष्ठ: 49  
11.  नींद, जब आप होते हैं केवल आप पृष्ठ: 52
12.  जो यादों का धुंधलका साफ हो जाए पृष्ठ: 56
13.  कहीं पाँव रोक न लें सिद्धियाँ पृष्ठ: 60  
14.  रस्सी की तरह घिस दें-चुनौतियाँ के पत्थर पृष्ठ: 64  
15.  बिन श्रद्धा-विश्वास के नहीं सधेगा अभ्यास पृष्ठ: 67  
16.  वैराग्य ही देगा साधना में संवेग पृष्ठ: 71  
17.  प्रभु प्रेम से मिलेगा--वैराग्य का चरम पृष्ठ: 74
18.  जब वैराग्य से धुल जाए मन पृष्ठ: 78
19.  जिससे निर्बीज हो जाएं-सारे कर्म संस्कार पृष्ठ: 81  
20.  विदेह एवं प्रकृतिलय पाते हैं--अद्भुत अनुदान पृष्ठ: 84   
21.  इस जन्म में भी प्राप्य है--समाधि में सफलता पृष्ठ: 87  
22.  तीव्र प्रयासों से मिलेगी,समाधि में सफलता पृष्ठ: 90   
23.  चाहत नहीं,तड़प जगे पृष्ठ: 93   
24.  समर्पण से सहज ही मिल सकती है--सिद्धि पृष्ठ: 96
25.  ऐसा है--वह घट-घट वासी पृष्ठ: 99  
26.  बाँसुरी बनें तो गूँजे प्रभु का स्वर पृष्ठ: 102   
27.  गुरुओं के गुरु हैं,प्रभु पृष्ठ: 105   
28.  ॐकार को जाना,तो प्रभु को पहचाना पृष्ठ: 108   
29.  यदि जान सकें-जप की कला पृष्ठ: 111  
30.  आत्मसाक्षात्कार का साधन-जप पृष्ठ: 114  
31.  मंत्र में छिपी है, विघ्र विनाशक शक्ति पृष्ठ: 117  
32.  बहुत बड़ी है, आततायी विघ्रों की फौज पृष्ठ: 123   
33.  एक से ही हों एकाकार पृष्ठ: 127
34.  करुणा कर सकती है--चंचल मन पर काबू पृष्ठ: 130   
35.  बड़ा गहरा है प्राण व मन का नाता पृष्ठ: 134   
36.  ध्यान से उपजती है--अतीन्द्रिय संवेदना पृष्ठ: 138   
37.  ध्यान की गहराई में छिपा है--परम सत्य पृष्ठ: 142   
38.  राग शमन करता है--वीतराग का ध्यान पृष्ठ: 146
39.  अन्तर्चक्षु खोल देगा निद्रा का मर्म पृष्ठ: 150   
40.  अभिरुचि के ही अनुरुप हो ध्यान पृष्ठ: 154   
41.  अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान पृष्ठ: 158   
42.  स्फटिक मणि सा बनाइये पृष्ठ: 162   
43.  मंजिल नहीं,पड़ाव है--सवितर्क समाधि पृष्ठ: 166   
44.  सत्य का साक्षात्कार है निर्वितर्क समाधि पृष्ठ: 170  
45.  ध्यान की अनुभूतियों द्धारा ऊर्जा स्नान पृष्ठ: 173
46.  ध्यान का अगला चरण है--समर्पण पृष्ठ: 178   
47.  परम शुद्ध को मिलता है,अध्यात्म का प्रसाद पृष्ठ: 181   
48.  निर्मल मन को प्राप्त होती है,ऋतम्भरा प्रज्ञा पृष्ठ: 185   
49.  बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य पृष्ठ: 189   
50.  जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट़् पृष्ठ: 193   
51.  सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है--निर्बीज समाधि
पृष्ठ: 197

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