१०८ उपनिषद - ज्ञानखण्ड | 108 Upanisad Gyan Khand Book in Hindi

१०८ उपनिषद - ज्ञानखण्ड | 108 Upanisad Gyan Khand Book in Hindi

Product Code: HIN0057H_AG_09
Author Name : Pt. Shriram Sharma Acharya & Mata Bhagavati Devi Sharma
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 514 Pages_Big Size Book
Download : 1071
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Table Of Content
1.  संकेत विवरण पृष्ठ: 6
2.  भूमिका पृष्ठ: 7-26
3.  अमृतनादोपनिषद्‌ पृष्ठ: 27-33
4.  ईशावास्योपनिषद्‌ पृष्ठ: 34-37
5.  एकाक्षरोपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 38-40
6.  ऐतरेयोपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 41-49
7.  कठोपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 50-69
8.  केनोपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 70-74
9.  गायत्र्युपनिषद्‌ पृष्ठ: 75-82
10.  छान्दोग्योपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 83-196
11.  तैत्तिरीयोपनिष‌‍द्‌ पृष्ठ: 197-213
12.  नादबिन्दूपनिष‍द्‌ पृष्ठ: 214-221
13.  निरालम्बोपनिष‌‍द्‌ पृष्ठ: 222-226
14.  प्रणवोपनिषद्‌ पृष्ठ: 227-228
15.  प्रश्र्नोपनिषद्‌ पृष्ठ: 229-240
16.  बृहदारण्यकोपनिषद्‌ पृष्ठ: 241-357
17.  मन्त्रिकोपनिषद्‌ पृष्ठ: 358-360
18.  माण्डूक्योपनिषद्‌ पृष्ठ: 361-363
19.  मुण्डकोपनिषद्‌ पृष्ठ: 364-374
20.  मुद्गलोपनिषद्‌ पृष्ठ: 375-381
21.  मैत्रायण्युपनिषद्‌ पृष्ठ: 382-397
22.  शिवसंकल्पोपनिषद्‌ पृष्ठ: 398-398
23.  शुकरहस्योपनिषद्‌ पृष्ठ: 399-406
24.  श्र्वेताश्र्वतरोपनिषद्‌ पृष्ठ: 407-424
25.  सर्वसारोपनिषद्‌ पृष्ठ: 425-428
26.  स्कन्दोपनिषद्‌ पृष्ठ: 429-430
27.  परिशिष्ठ
28.  परिभाषा कोश पृष्ठ: 431-488
29.  मन्त्रानुक्रमणिका पृष्ठ: 489-512
  

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उपनिषद् में उप और नि उपसर्ग हैं । सद् धातु गति के अर्थ में प्रयुक्त होती है। गति शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भो में होता है । यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है । उप सामीप्येन, नि-नितरां, प्राम्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद अर्थात् जिस विद्या के द्वारा परब्रह्म का सामीप्य एवं तादात्म्य प्राप्त किया जाताहै, वह उपनिषद् है ।

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