१०८ उपनिषद - साधना खण्ड | 108 Upanisad Sadhana Khand Book in Hindi

१०८ उपनिषद - साधना खण्ड | 108 Upanisad Sadhana Khand Book in Hindi

Product Code: HIN0059H_AG_11
Author Name : Pt. Shriram Sharma Acharya & Mata Bhagavati Devi Sharma
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 360 Pages_Big Size Book
Download : 842
Availability: 2

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Table Of Content
1.  प्रकाशकीय पृष्ठ: 7
2.  संकेत विवरण पृष्ठ: 8
3.  अक्षमालिकोपनिषद्  पृष्ठ: 9-14
4.  अक्ष्युपनिषद्  पृष्ठ: 15-20
5.  अद्वयतारकोपनिषर्  पृष्ठ: 21-25
6.  कलिसंतरणोपनिषद्  पृष्ठ: 26-27
7.  कालाग्निरुद्रोपनिषद्  पृष्ठ: 28-29
8.  कृष्णोपनिषद्  पृष्ठ: 30-33
9.  गणपत्युपनिषद्  पृष्ठ: 34-36
10.  गरुडो़पनिषद्  पृष्ठ: 37-43
11.  गायत्री रहस्योपनिषद्  पृष्ठ: 44-48
12.  गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद्  पृष्ठ: 49-56
13.  चतुर्वेदोपनिषद्  पृष्ठ: 57-58
14.  चाक्षुषोपनिषद्  पृष्ठ: 59-60
15.  तुलस्युपनिषद  पृष्ठ: 61-63
16.  त्रिपुरोपनिषद्  पृष्ठ: 64-66
17.  त्रिशिखिब्रह्मणोपनिषद्  पृष्ठ: 67-82
18.  दक्षिणामूत्र्युपनिषद  पृष्ठ: 83-86
19.  देव्युपनिषद  पृष्ठ: 87-90
20.  ध्यानविन्दूपनिषद्  पृष्ठ: 91-102
21.  नारायणोपनिषद्  पृष्ठ: 103-104
22.  नीलरुद्रोपनिषद्  पृष्ठ: 105-107
23.  नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्  पृष्ठ: 108-126
24.  नृसिंहषटचक्रोपनिषद्  पृष्ठ: 127-129
25.  पाशुपत ब्राह्मणोपनिषद  पृष्ठ: 130-138
26.  प्राणाग्निहोत्रोपनिषद  पृष्ठ: 139-142
27.  बह्वृचोपनिषद्  पृष्ठ: 143-144
28.  भावनोपनिषद्  पृष्ठ: 145-147
29.  महोपनिषद्  पृष्ठ: 148-194
30.  योगकुण्डल्युपनिषद  पृष्ठ: 195-209
31.  योगचूडामण्युपनिषद्  पृष्ठ: 210-222
32.  योगराजोपनिषद्  पृष्ठ: 223-224
33.  राधोपनिषद्  पृष्ठ: 225-226
34.  रामपूर्वतापिन्युपनिषद्  पृष्ठ: 227-236
35.  रुद्रहृदयोपनिषद्  पृष्ठ: 237-241
36.  रुद्राक्षजाबालोपनिषद्  पृष्ठ: 242-248
37.  रुद्रोपनिषद्  पृष्ठ: 249-250
38.  लाड्गूलोपनिषद्  पृष्ठ: 251-254
39.  शरभोपनिषद्  पृष्ठ: 255-259
40.  सरस्वती रहस्योपनिषद्  पृष्ठ: 260-267
41.  सावित्र्युपनिषद  पृष्ठ: 268-270
42‍. सीतोपनिष्द्‌ पृष्ठ: 271-275
43.  सूर्योपनिषद्‌ पृष्ठ: 276-278
44.  सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद्‌ पृष्ठ: 279-286
45.  परिशिष्ठ 
46.  परिभाषा कोश पृष्ठ: 287-330
47.  मन्त्रानुक्रमणिका पृष्ठ: 331-356
48.  रेखाचित्र पृष्ठ: 357-360


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उपनिषद् में उप और नि उपसर्ग हैं । सद् धातु गति के अर्थ में प्रयुक्त होती है। गति शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भो में होता है । यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है । उप सामीप्येन, नि-नितरां, प्राम्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद अर्थात् जिस विद्या के द्वारा परब्रह्म का सामीप्य एवं तादात्म्य प्राप्त किया जाताहै, वह उपनिषद् है ।

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