न्याय एवं वैशेषिक दर्शन | Nyay Evam Vaishesik Darshan Book in Hindi

न्याय एवं वैशेषिक दर्शन | Nyay Evam Vaishesik Darshan Book in Hindi

Product Code: HIN0061H_AG_13
Author Name : Pt. Shriram Sharma Acharya & Mata Bhagavati Devi Sharma
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 400 Pages_Big Size Book
Download : 638
Availability: 6

न्याय एवं वैशेषिक दर्शन pdf book free download

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Table Of Content
1.  भुमिका (न्याय दर्शन) पृष्ठ: 5-14
2.  अध्याय-१ / आह्निक-१ पृष्ठ: 15-33
3.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 34-43
4.  अध्याय-२ / आह्निक-१ पृष्ठ: 44-72
5.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 73-101
6.  अध्याय-३ / आह्निक-१ पृष्ठ: 102-133
7.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 134-161
8.  अध्याय-४ / आह्निक-१ पृष्ठ: 162-188
9.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 189-206
10.  अध्याय-५ / आह्निक-१ पृष्ठ: 207-224
11.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 225-232
12.  भुमिका (वैशेषिक दर्शन) पृष्ठ: 3-12
13.  अध्याय-१ / आह्निक-१ पृष्ठ: 13-22
14.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 23-27
15.  अध्याय-२ / आह्निक-१ पृष्ठ: 28-36
16.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 37-47
17.  अध्याय-३ / आह्निक-१ पृष्ठ: 48-53
18.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 54-60
19.  अध्याय-४ / आह्निक-१ पृष्ठ: 61-65
20.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 66-69
21.  अध्याय-५ / आह्निक-१ पृष्ठ: 70-76
22.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 77-85
23.  अध्याय-६ / आह्निक-१ पृष्ठ: 86-91
24.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 92-98
25.  अध्याय-७ / आह्निक-१ पृष्ठ: 99-106
26.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 107-116
27.  अध्याय-८ / आह्निक-१ पृष्ठ: 117-120
28.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 121-123
29.  अध्याय-९ / आह्निक-१ पृष्ठ: 124-129
30.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 130-136
31.  अध्याय-१०/ आह्निक-१ पृष्ठ: 137-140
32.                   आह्निक-२ पृष्ठ: 141-144
33.  परिशिष्ट-  
34.  शब्दानुक्रमणिका ( न्याय दर्शन)  पृष्ठ: 377-385
35.  सूत्रानुक्रमणिका ( न्याय दर्शन)  पृष्ठ: 386-390
36.  शब्दानुक्रमणिका ( वैशेषिक दर्शन)  पृष्ठ: 391-396
37.  सूत्रानुक्रमणिका ( वैशेषिक दर्शन) पृष्ठ: 397-400

 

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मानव जीवन का लक्ष्य एवं सांसारिक स्थिति की विवेचना अनुभवों के आधार पर करनेवाला न्यायदर्शन, वस्तुवाद का पोषक है । इसके अनुसार जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष है, जिसकेद्वारा दुःखों की पूर्णत: निवृत्ति हो जाती है । न्यायके मतानुसार जीवात्मा कर्त्ता एवं भोक्ता होने के साथ-साथ, ज्ञानादि से सम्पन्न नित्य तत्त्व है । यह जहाँ वस्तुवाद को मान्यता देता है, वहीं यथार्थ वादका भी पूरी तरह अनुगमन करता है । मानव जीवन में सुखों की प्राप्ति का उतना अधिक महत्त्व नहींहै, जितना कि दुःखों की निवृत्ति का । ज्ञानवान् होया अज्ञानी, हर छोटा-बड़ा व्यक्ति सदैव सुख प्राप्तिका प्रयत्न करता ही रहता है । सभी चाहते हैं कि उन्हें सदा सुख ही मिले, कभी दुःखों का सामनान करना पड़े, उनकी समस्त अभिलाषायें पूर्णहोती रहें; परन्तु ऐसा होता नहीं । अपने आप को पूर्णत: सुखी कदाचित् ही कोई अनुभव करता हो । जिनको भरपेट भोजन, तन ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र तथा रहने के लिए मकान भी ठीक से उपलब्ध नहीं तथा जो दिन भर रोजी-रोटी के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनकी कौन कहे; जिनके पास पर्याप्त धन-साधन, श्रेय-सम्मान सब कुछ है, वेभी अपने दुःखों का रोना रोते देखे जाते हैं । आखिरऐसा क्यों है? क्या कारण है कि मनुष्य चाहता तो सुख है; किन्तु मिलता उसे दुःख है । सुख-सन्तोषके लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हुए भी वह अनेकानेक दुःखों एवं अभावों को प्राप्त होता रहताहै । आज की वैज्ञानिक समुन्नति से, पहले की अपेक्षा कई गुना सुख के साधनों में बढोत्तरी होने

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