सांख्य एवं योगदर्शन | Sankhy Evam Yog Darshan Book in Hindi

सांख्य एवं योगदर्शन | Sankhy Evam Yog Darshan Book in Hindi

Product Code: HIN0060H_AG_12
Author Name : Pt. Shriram Sharma Acharya & Mata Bhagavati Devi Sharma
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 304 Pages_Big Size Book
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सांख्य एवं योगदर्शन pdf book free download

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Table Of Content
1.  भूमिका ( सांख्य दर्शन)  पृष्ठ: 5-16
2.  प्रथम अध्याय  पृष्ठ: 17-64
3.  द्वितीय अध्याय  पृष्ठ: 65-78
4.  तृतीय अध्याय  पृष्ठ: 79-106
5.  चतुर्थ अध्याय  पृष्ठ: 107-118
6.  पंचम अध्याय  पृष्ठ: 119-150
7.  षष्ठ अध्याय  पृष्ठ: 151-170
8.  भूमिका ( योगदर्शन)  पृष्ठ: 3-12
9.  समाधि पाद - १  पृष्ठ: 13-38
10.  साधन पाद - २  पृष्ठ: 39-66
11.  विभूति पाद - ३  पृष्ठ: 67-92
12.  कैवल्य पाद - ४  पृष्ठ: 93-110
13.  परिशिष्ट- 
14.  शब्दानुक्रमणिका ( सांख्यदर्शन)  पृष्ठ: 281-288
15.  सूत्रानुक्रमणिका ( सांख्यदर्शन)  पृष्ठ: 289-293
16.  शब्दानुक्रमणिका ( योगदर्शन)  पृष्ठ: 294-302
17.  सूत्रानुक्रमणिका ( योगदर्शन) पृष्ठ: 303-304
   

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दर्शन शब्द का अर्थ भारतीय मनीषियों के उर्वर मस्तिष्क से जिस कर्म, ज्ञान और भक्तिमय त्रिपथगा का प्रवाह उद्भूत हुआ, उसने दूर-दूर के मानवों के आध्यात्मिक कल्मष को धोकर उन्हें पवित्र, नित्य-शुद्ध-बुद्ध और सदा स्वच्छ बनाकर मानवता के विकास में योगदान दिया है । इसी पतित पावनी धारा को लोग दर्शन के नाम से पुकारते हैं । अन्वेषकों का विचार है कि इस शब्द का वर्तमान अर्थ में सबसे पहला प्रयोग वैशेषिक दर्शन में हुआ । दर्शन शब्द का अर्थ- दर्शन शब्द पाणिनीय व्याकरणा नुसार दृशिर प्रेक्षणे धातु से ल्युट प्रत्यय करने से निष्पन्न होता है । अतएव दर्शन शब्द काअर्थ दृष्टि या देखना, जिसके द्वारा देखा जाय या जिसमें देखा जाय होगा । दर्शन शब्द का शब्दार्थ केवल देखना या सामान्य देखना ही नहीं है इसीलिए पाणिनि ने धात्वर्थ में प्रेक्षण शब्द का प्रयोग किया है । प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तश्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है । इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नामदर्शन है । जहाँ पर इन सिद्धान्तों का संकलन हो,उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा,जैसे-दर्शन, वैशेषिक दर्शन, मीमांसा दर्शन आदि-आदि । दर्शन ग्रन्थों को दर्शन शास्त्र भी कहते हैं । यह शास्त्र शब्द शासु अनुशिष्टौ से निष्पन्न होनेके कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करनेके कारण ही दर्शन-शास्त्र कहलाने का अधिकारी है । दर्शन अर्थात् साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के अन्तश्चक्षु या दिव्य चक्षुओं द्वारा देखे गये तत्त्वों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है । दर्शन का प्रतिपाद्य विषय - दर्शनों का उपदेश वैयक्तिक जीवन के सम्मार्जन और परिष्करण के लिए ही अधिक उपयोगी है ।

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