ज्ञानयज्ञ का महत्व और योजनाएँ | Gyanyagy Ka Mahatv Aur Yojanaen Book in Hindi

ज्ञानयज्ञ का महत्व और योजनाएँ | Gyanyagy Ka Mahatv Aur Yojanaen Book in Hindi

Product Code: HIN0039H_AA_41
Author Name : NA
Publication : Yug Nirman Yojana, Mathura
Totap Pages : 72 Pages_Regular Size Book
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Table Of Content
1.  वर्तमान भारत की विषम परिस्थितियाँ पृष्ठ: 5
2.  देश की मूलभूत समस्याएँ पृष्ठ: 6
3.  परमात्मा का आश्वासन पृष्ठ: 8
4.  महामानव बनने के लिए त्याग-बलिदान आवश्यक पृष्ठ: 14
5.  अज्ञान के असुर से रक्षा करें पृष्ठ: 19
6.  ज्ञान का दीपक जलता रहे पृष्ठ: 22
7.  ज्ञानयज्ञ की लपटे आकाश छूएँगी पृष्ठ: 25
8.  ज्ञानयज्ञ से व्यक्तित्ववान आत्माओं का निर्माण पृष्ठ: 35
9.  भावी महाभारत लड़ेंगे युगनिर्माणी पृष्ठ: 40
10.  ब्रह्मभोज का सच्चा स्वरूप-ज्ञानयज्ञ पृष्ठ: 43
11.  ज्ञानयज्ञ की क्रान्तिकारी योजनाएँ पृष्ठ: 49
12.  झोला पुस्तकालय योजना पृष्ठ: 56
13.  स्वाध्याय मण्डलों की योजना पृष्ठ: 58
14.  पत्रिका विस्तार योजना पृष्ठ: 63
15.  पुस्तक मेलों का आयोजन पृष्ठ: 64
16.  ब्रह्म भोज योजना पृष्ठ: 69
17.  ज्ञान मन्दिरों की स्थापना पृष्ठ: 70
18.  उपसंहार पृष्ठ: 72

 

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वर्तमान भारत की विषम परिस्थितियाँ 

जिन परिस्थितियो में हमें आज जीवनयापन करना पड़ रहा है, उन्हें बदलना नितांत आवश्यक है ।। जीवनोपयोगी साधनों का अभाव अनेकों को कष्ट दे रहा है ।। यों धरती माता का भंडार खाली नहीं हो गया, उसके पास अपनी प्रत्येक संतान का समुचित निर्वाह कर सकने के लिए व्यापक धन- धान्य प्रचुर मात्रा में विद्यमान है, पर उसके उत्पादन, वितरण एव सग्रह की वर्तमान प्रणाली इतनी दूषित है कि चंद श्रीमंतों को छोड़कर शेष सभी को अत्यधिक कष्ट के साथ गुजर करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है ।। सामाजिक न्याय के अभाव में मनुष्य, मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है ।। अमुक वंश, जाति में पैदा होने के कारण लोग ऊँच या नीच माने जाते हैं और उन्हें अहंकार करने एवं तिरस्कृत होने का अवसर मिलता हैं ।। स्त्रियाँ पुरुषों की खरीदी हुई जड़- संपत्ति की तरह दिन गुजार रही हैं ।। सामाजिक कुरीतियों का ऐसा बोलबाला है कि विवाह- शादी जैसे मामूली से आयोजन को आकाश- पाताल जैसा तूल मिल गया है और उस कुचक्र में जन- समाज की आर्थिक एवं पारिवारिक सुव्यवस्था चकनाचूर हुई जा रही है ।। इन परिस्थितियों में हमें घुटन के साथ जिंदा रहना पड़ रहा है, वह दिन- दिन असह्य होती जाती है ।। युग की आत्मा पुकारती है कि इन विषमताओं को बदला ही जाना चाहिए ।। 

अपना जन- जीवन दर्शन आज कितना क्षुद्र एवं घृणित है, इसे देखकर विवेक की आत्मा सिहर उठती है ।। हर आदमी के सामने धन का बिना उचित- अनुचित का ध्यान किए प्रचुर मात्रा में उपार्जन एवं संग्रह करना ही एकमात्र लक्ष्य बना हुआ है ।। उस उपार्जन का उपयोग वह केवल अपने व्यक्तिगत विलास, स्वार्थ एवं अहंकार की पूर्ति तक ही सीमित रखे हुए है ।। 

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