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ऋषि चिंतन के सान्निध्य में भाग १

ऋषि चिंतन के सान्निध्य में भाग १

Author: Pt. Shriram Sharma Achary & Mata Bhagavati Devi Sharma Publisher: Yug Nirman Yojana, Mathura Code: HINB0129 52978 Views In Stock (2)
₹275.00
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आत्मनिवेदन
अंतिम संदेश
युगऋषि परम पूज्य पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अंतिम संदेश
वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा
गायत्री का दर्शन
देवसंस्कृति की माता गायत्री
गायत्री महामंत्र की विलक्षण शक्ति
देव संस्कृति का दर्शन गायत्री मंत्र
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
बुझा सकेगी इसे न झंझा
ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल
युगऋषि की अभिलाषा
मेरी अंतिम इच्छा
युगऋषि की तपस्थली गायत्री तपोभूमि
हमारा युग निर्माण सत्संकल्प
उठो हिम्मत करो
आनंस की खोज
पहले दो,पीछे पाओ
उद्‌देश्य उँचा रखें
तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को
आत्मिक तृप्ति का आधार
गीता का कर्मयोग
कर्म या पाखंड
आत्मशक्ति का विकास
सच्चा धर्मात्मा कौन
प्रभु की माया
कर्तव्यपालन
द्रृष्टिकोण बदलो
हदय मंदिर के अंदर संतोष
अंतर्मुखी होने पर ही शांति
असत्य की ओर नहीं,सत्य की ओर
सत्य का प्रकाश
दूसरों पर दया करो
तृष्णाएँ छोड़ो
सत्संग का महत्व
सत्यस्वरुप आत्मा
सथायी सुख कहाँ है
सच्चा और अच्छा व्यापार
ज्ञान का संचय
क्रोध मत करो क्षमा करो
बादलों की तरह बरसते रहो
प्रार्थना कब सफल होगी
अपनी रोटी बाँटकर खाइए
किसी परिस्थिति में विचलित न हों
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है
प्रेम ही सर्वोपरि है
तुम बीच में खड़े हो
प्रेम ही सुख शांति का मूल है
धर्म का सार
ईश्वर कहाँ है
जीवन का सद्‌व्यय
ज्ञानयोग की एक सुलभ साधना
सहसयता में जीवन की सार्थकता
मृत्यु का भय दूर कर दीजिए
रोने से काम न चलेगा
जिंदगी में आनंद का निर्माण करो
मन जीता तोजग जीता
ज्ञान की उपासना कीजिए
हम स्वयं अपने स्वामी बनें
दुर्भावनाओं को जीतो
प्रेम का वास्तविक स्वरुप
शक्ति संचय कीजिए
शेखी मत बधारो
विचार ही कर्म के बीज हैं
जीवन को तपस्यामय बनाइए
सत्यता में अकूत बल भरा हुआ है
अपने को जीतो
हमारी दुनियाँ वैसी,जैसा हमारा मन
मन से भय की भावनाएँ निकाल फेंकिए
अपनी भूलों को स्वीकार कीजिए
जोश के साथ होश
मानसिक विकास का अटल नियम
जीने योग्य जीवन जियो
जीवन की बागडोर आपके हाथ में
कर्म की स्वतंत्रता
भलाई करना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी
दु:ख काल्पनिक होते हैं
अच्छाइयाँ देखिए अच्छाइयाँ फैलेंगी
वर्तमान परिस्थितियाँ हमने स्वयं उत्पन्न की हैं
आत्मनिर्माण सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ है
पूर्ण शांति की प्राप्ति
जीवन में सच्ची शांति के दर्शन
अपने को आवेशों से बचाइए
बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए
सत्य की अकूत शक्ति पर विश्वास कीजिए
सद्‌ज्ञान का संचय करो
सच्ची कमाई,सद्‌गुणों का संग्रह
स्वर्ग और नरक इसी लोक में
अपनी दुनियाँ अपनी द्रृष्टि में
अधिकार और कर्तव्य
अपनी शक्तियों को विकसित कीजिए
पराजय विजय की पहली सीढ़ी है
मृत्यु से जीवन का अंत नहीं होता
आध्यात्मिकता की कसौटी
गुण ग्राहक द्रृष्टि को जाग्रत कीजिए
तुम पापी नहीं पुण्यात्मा हो
जानी तथा ज्ञानी
अपने ऊपर विश्वास कीजिए]
बुद्धिमानो मूर्ख क्यों बनते हो
लक्ष्यविहीन जीवन
शारीरिक और बौद्धिक श्रम
साधक को सब कुछ भूल जाना चाहिए
विचारों का केंद्रबिंदु क्यों और कैसे
दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ
परिस्थितियों के अनुकूल बनिए
समाज सेवा से ही आत्मरक्षा
अनीति से धन मत जोड़िए
अपने में अच्छी आदतें डालिए
अपनी दशा सुधारिए
आत्मज्ञान को प्राप्त करो
धर्म की प्रथम घोषणा
सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म
भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है
ब्रह्म की सर्वव्यापकता
अपनी उतम कल्पनाओं को चरितार्थ कीजिए
विश्वास करो कि तुम महान हो
हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण
अपनी योजना पर मजबूती से टिके रहिए
हमारी आर्थिक कठिनाइयाँ कैसे दूर हों
लक्ष्य में तन्मय हो जाइए
सत्कर्मो से दुर्भाग्य भी बदल सकता है
मरने से डरना क्या
आत्मसुधार की एक नवीन योजना
मनुष्य की महानता का रहस्य
अपने लक्ष्य पर केंद्रित हो जाइए
देवत्व का अवलंबन
हम दिव्य जीवन जिएँ
विश्वमाता की पवित्र आराधना
संवेदना शक्ति का विकास कीजिए
आप निराश मत होइए
बच्चों के निर्माण का दायित्व
सच्चे मित्र का चुनाव
ईश्वरीय सता का का तत्वज्ञान
आत्मा ब्रह्मरुप है,इसे पहचानिए
सर्वत्र अपना ही प्राण बिखरा पड़ा है
जैसे आप वैसा आपका संसार
अपना द्रृष्टिकोण ऊँचा रखें
निष्काम भाव से कर्म करते रहिए
अपने को बुराइयों से बचाइए
सत्‌ और असत्‌ का अंतर
आवेश और उद्धेग से बचिए
मानव जीवन की सफलता का प्रधान केंद्र प्रेम
अमर्यादित इच्छाएँ त्याज्य हैं
चित शुद्धि की आवश्यकता
मनुष्य जीवन का उद्‌देश्य
विचार और कार्य में समन्वय कैसे हि
जीवन और सिद्धांत
अपने आप के साथ सद्‌व्यवहार करें
लोक व्यवहार की कुशलता के गुप्त रहस्य
दूसरों के कामों में हस्तक्षेप
आदर्श जीवन का रहस्य
चित का संशोधन और परिमार्जन
उद्धिग्न मत होइए
कठिनाई का सामना करने को तैयार रहो
अकेले चलना पड़ेगा
व्यावहारिक अध्यात्मवाद
अंत:शुद्धि की आवश्यकता
किसी का बुरा मत सोचिए
धर्मो की मूलभूत एकता
मानव जीवन का तत्वज्ञान
मन में सद्‌भावनाएँ रखें
ईश्वर शक्ति का आदि स्त्रोत
ये भयंकर भूलें कदापि न करें
जीवन यज्ञ
श्रेष्ठतम कार्य करें
आत्मा का आदेश पालन करें
प्रभु की शरण में
पहले अपने को सुधारो
विचारों की प्रचंड शक्ति
अरे इस आसुरी संस्कृति को रोको
कर्मयोग का रहस्य
धृणा नहीं प्रेम कीजिए
शांत विचारों की शक्ति
विचारों की शक्तिशाली दुनियाँ
प्रतिस्पर्द्धा की भावना से हानि
जीवन का चरम लक्ष्य ऐसे प्राप्त करो
मानसिक संतुलन आवश्यक
मनुष्य जीवन ऊँचे उद्‌देशयों के लिए
बातें नहीं काम कीजिए
संतोषामृत पिया करें
त्याग और शक्ति भोग और अशकता
भारतीय संस्कृति का प्रसार
महात्मा बुद्ध के व्यावहारिक उपदेश
सद्‌वृतियाँ सद्‌मार्ग की और चलती हैं
ईश्वर से नाता जोड़ो
भगवान का अनंत भंडार
आत्मनिरीक्षण आवश्यक है
अपने चित को प्रसन्न रखिए
सच्चा धन कहाँ है
आलस्य न करना ही अमृत पद है
त्याग या स्वार्थ
सत्संग का महत्व
दुर्बलता एक पाप है
असीम संग्रह और उपभोग की तृष्णा
विलासी मनुष्य धर्मात्मा नहीं हो सकता
आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग
पाप की कमाई से सच्चा सुख नहीं मिलता
कमाई में बहुतों का हिस्सा
Book Size Big
Pages 226
Publisher Yug Nirman Yojana, Mathura
Publication Year 2013
Format 19x25 CM
Weight 0.94
Code H_SJ_09

Gayatri Pariwar Books, Pt. Shriram Sharma Acharya, Free Books for Download, vicharkrantibooks, awgp, rishichintan,

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