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अपनों से अपनी बात-आत्मबोध,आत्म-निर्माण और आत्म विकास को राह पर चल पड़ें
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Author:
N/A
Code:
AJH1972Sep_26
#आत्मबोध
#निर्माण
#विकास
अपनों से अपनी बात-आत्मबोध,आत्म-निर्माण और आत्म विकास को राह पर चल पड़ें Document
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Topic Of Source Title
अन्तःकरण में ईश्वर का दर्शन
समुद्री लहरों की तरह हमारा जीवन उछले, गरजे और आगे बढ़े
मृदुलता और कठोरता से ओत-प्रोत मानवीकाया
शान्ति बाहर नहीं- भीतर खोजनी पड़ेगी
पृथ्वी का ओर छोर-बनाम जीवन का आदि अन्त
दर्शन पर्याप्त नहीं, भगवान को साथी और सेवक बनायें
चुम्बक और मानवीय प्रकृति का सादृश्य
सुख भगवान की दया, दुःख उनकी कृपा
मरने के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है।
आलोचना से डरें नहीं- उसके लिये तैयार रहें।
हारमोन स्रावों का उद्गम अंतःचेतना से
शरीरगत विद्युतशक्ति को सुरक्षित रखें- बढ़ायें
हम ईश्वर के होकर रहें- उसी के लिये जियें।
मस्तिष्कीय स्तर मोड़ा और मरोड़ा जा सकता है
प्रतिविश्व -प्रति पदार्थ-शक्ति का अजस्त्र स्रोत
परमेश्वर का निराकार और साकार स्वरूप
“साँस मत लो- इस हवा में जहर है।”
दिव्य अग्नि का अभिवर्धन, उन्नयन
परमार्थ के लिये अपने को खतरे में डालने वाले
हम सोमरस पियें- अजर-अमर बनें।
संसार में त्रिविधि कष्ट और उनका निवारण
साहसी पक्षी-जिन्हें पुरुषार्थ के बिना चैन नहीं
अस्वस्थता की टहनी नहीं-जड़ उखाड़ें।
जीवन तत्व की गंगोत्री- प्राणशक्ति
अतः करण को पवित्र बनाने की प्रभु प्रार्थना
अपनों से अपनी बात-आत्मबोध,आत्म-निर्माण और आत्म विकास को राह पर चल पड़ें (लेख शृंखला)
जय बोलो श्रीराम की (Kahani)
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