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जलो और जग को उजाला जुटाओ
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AJH1970Feb_28
#जलो
#जग
#उजाला
जलो और जग को उजाला जुटाओ Document
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Topic Of Source Title
अध्यात्म विकृत नहीं_परिष्कृत रूप में ही जी सकेगा_AJH1970Feb
व्यक्ति-व्यक्ति जीवन सुँदर बनाने में सहायता करे
सुख-दुख में एक समान
अति सूक्ष्म जीवाणुओं की महत्तम सत्ता
लघुतम से महत्तम-महत्तम से विराट्तम
ज्ञानार्जन के स्त्रोत सूखे कि मृत्यु हुई
विज्ञान की अपूर्णतायें और उनका विकल्प
गृहस्थ का अधिकार
जाबालि का ब्रह्म-दर्शन
अध्यात्म-मानवीय प्रगति का आधार
चालीस इंच की पत्नी चार इंची पति
वंश, कुल, गोत्र
जीवन क्रियाशील और ऊर्ध्वगामी बने
विज्ञान और यंत्रीकरण कितने पीड़ा-जनक
मद्यपान महामारी और महायुद्ध से भी अधिक भयंकर
ऊर्ध्वगामी मन की सामर्थ्य
अपनी मान्यताओं के प्रति आस्थावान रहें
बदलती परिस्थितियों में स्वयं भी बदलें
बच्चे यों न बढ़ाइये कि उन्हें पालते-पालते मर जाइये
चन्द्रगुप्त जीता, पर तब जब उतावलापन मिटा
संगठित जातियाँ चट्टानवत् सुदृढ़ होती है
साधु का शाप यों फलित हुआ
हम असत्य का आश्रय न लें
मानव-जीवन का प्रादुर्भाव और 84 लाख योनियाँ
स्वप्न कभी-कभी सत्य क्यों होते हैं
जीवन को उत्तमता की ओर बढ़ाइए
गायत्री उपासना से ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति
अपनों से अपनी बात-अध्यात्म विकृत नहीं-परिष्कृत रूप में ही जी सकेगा (लेख शृंखला)
जलो और जग को उजाला जुटाओ (कविता) (कविता)
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