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१/३४ विवेक संगत आज्ञाकारिता का श्रेष्ठ आदर्श
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Author:
NA
Code:
HINR1335_34
Source:
प्रकाश चित्र व्याख्या (Book)
१/३४ विवेक संगत आज्ञाकारिता का श्रेष्ठ आदर्श Document
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Topic Of Source Title
१/१ उद्धत अपव्यय का अजगर (मनुष्य को निगलता हुआ अजगर)
१/२ भाग्यवाद की मान्यता (तिलकधारी ज्योतिषी)
१/३ भूत पलीत और उद्भिज देवी देवता (झाड़ा लगाता हुआ ओझा)
१/४ उपार्जन श्रम और न्यायपूर्वक ही किया जाय (ताश,चौपड़ का खैल)
१/५ मिलावट देश द्रोही दुष्प्रवृति (दूध,घी में मिलावट करते हुए)
१/६ सम्पति समाज की है (जेवरों से भरी अलमारी)
१/७ परावलम्बी नारी और उसकी पराधीनता (बहू को झाडू से मारती हुई सास)
१/८ नारी उत्कर्ष के लिए स्त्रियां स्वावलम्बी बनें (कुर्शी पर बैठी हुई महिला)
१/९ अश्लीलता की बाढ़ हमें पतित बना रही हैं (तालाब नहाते हुए स्त्री पुरुष)
१/१० अश्लीलता का होलिका दहन (जलती हुई लकड़ियो पर महिला)
१/११ शौर्य और साहस की जीवित प्रतिमा लक्ष्मीबाई (घोड़े पर सवार रानी लक्ष्मीबाई)
१/१२ ऊच नीच की भावना का घातक परिणाम (मुसलमान ईसाई व पंडित)
१/१३ पशुबलि भारतीय धर्म का कलंक (पशुओं को काटता हुआ पुजारी)
१/१४ मांसाहार शरीर और मनुष्यता की विडम्बना (माँस बेचता हुआ कसाई)
१/१५ मृतक भोज की क्या आवश्यकता (भोज का द्दश्य)
१/१६ श्राद्ध का सच्चा स्वरुप समझा जाय (विधालय का द्दश्य)
१/१७ जेवरों का भौंड़ा प्रदर्शन (जेवर खरीदते हुई स्त्री पुरुष)
१/१८ नशेबाजी की मूर्खता और अध:पतन (नशा सेवन करते हुए चार पुरुष)
१/१९ नशेबाज के परिवार की दुर्गति (हाथ ऊपर किये हुए स्त्री व बच्चे)
१/२० गन्दगी धृणित असभ्यता (गन्दे गाँव का द्दश्य)
१/२१ स्वच्छता जीवन की अनिवार्य आवश्यकता (स्वच्छ गाँव का द्दश्य)
१/२२ रिश्वत की सर्वघाती प्रवृति (रिश्वत लेता हुआ बाबू)
१/२३ अनाधिकारियों को विवाह न करते दिया जाय (चारपाई पर सोता हुआ रोगी पुरुष)
१/२४ अनमेल विवाह रोके जाये (विवाह का द्दश्य)
१/२५ लोभ का यह धृणित रुप तो छोड़े (बिखरा हुआ दहेज का सामान)
१/२६ नारी को इस धृणित स्थिति से उबारा जाय (बातें करते हुए स्त्री व पुरुष)
१/२७ सहयोगी दीखने वाले वैरी (घर से निकलता हुआ परिवार)
१/२८ विवाहोन्माद हमें जर्जर बना रहा है (बारात व आतिशबाजी)
१/२९ आदर्श विवाहों का प्रचलन किया जाय (विवाह मण्डप में वर और वद्धू)
१/३० धन लोलुप अभिभावकों का तिरस्कार (द्धार पर खड़े नव दम्पति)
१/३१ दहेज के दानव के विरिद्ध युवकों को प्रेरित करे (हाथ जोड़ता हुआ युवक)
१/३२ सन्मार्ग पर द्दढ़ रहें (प्रहलाद और हिरण्यकश्यपु)
१/३३ अनीति का समर्थन किसी भी शर्त पर न किया जाय (सिंहासनारुढ़ रावण)
१/३४ विवेक संगत आज्ञाकारिता का श्रेष्ठ आदर्श (केकेई व भरत)
१/३५ अपराजेय नीति का बल (जटायु पर प्रहार करता हुआ रावण)
१/३६ शस्त्र और शाम्य दोनों से ही अनीति का दमन (गुरु गोविन्दसिंह सैनिक व संत)
१/३७ धर्म और संस्कृति के प्रति-निष्ठावान गुरु गोविंद सिंह (बालकों का दीवार में चिना जाना)
१/३८ अनाचार के विरुद्ध चुप रहना एक सामाजिक अपराध (राम का समुद्ध पर बाण सन्धान)
१/३९ उचित प्रतिरोध में समर्थो का सहयोग (ऋचि अगस्त्य द्धारा समुद्र पान)
१/४० युग शक्ति की प्रतीक लाल मशाल (लाल मशाल)
२/१ संघ शक्ति की प्रतीक दुर्गा व उसका अवतरण (सिंह वाहिनी दुर्गा)
२/२ सामुहिक श्रमदान का महत्व (भयवान श्रीकृष्ण व ग्वाल)
२/३ यज्ञमय जीवन जियें (यज्ञ भगवान)
२/४ परस्पर सहयोग का सृष्टि क्रम व्यक्ति जीवन में भी अपनायें (वर्षा का द्दश्य)
२/५ सद्ज्ञान का प्रचार हर समर्थ का धर्म (सम्राट अशोक व राजकुमार महेन्द्र)
२/६ सामर्थ्य को सार्थक बनाये (स्वामी शंकराचार्य और मान्धाता)
२/७ सम्पति समाज की (दानी भामाशाह)
२/८ अपनी उपलब्धियोंका औरों को उँचा उठाने में उपयोग (ईश्वर चन्द्र विधासागर का आर्थिक अनुदान)
२/९ परमार्थियों के लिए सहयोगी कम नहीं (हिमालय से निकलती गंगा)
२/१० युग निर्माण योजना का केन्द्र (युग निर्माण योजना का भवन)
२/११ पूज्य गुरुदेव द्धारा विचार क्रान्ति (पूज्य गुरुदेव द्धारा साहित्य सृजन)
२/१२ झोला पुस्तकालय विचार क्रान्ति का अस्त्र (झोला पुस्तकालय द्धारा ज्ञानदान)
२/१३ ज्ञान देवता की रथ यात्रा (ज्ञान का प्रकाश पुंज ज्ञान रथ)
२/१४ जाग्रत देवालय ज्ञान मन्दिर (ज्ञान मन्दिर)
२/१५ प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता (प्रौढ़ पाठशाला)
२/१६ प्रौढ़ महिलाओं को भी शिक्षित किया जाय (प्रौढ़ महिला पाठशाला)
२/१७ कथा वार्ताओं की पुण्य प्रेरणा (सर्वोपयोगी कथा वार्ता)
२/१८ पर्वो को प्रेरणा प्रद ढंग से मनाया जाय (पर्वों की उचित प्रेरणा)
२/१९ प्रकाश चित्र यन्त्र तथा अभिनय की प्रतिभाशाली प्रक्रिया (प्रचार के उपकरण)
२/२० संगीत सम्मेलन तथा कविता सम्मेलन (संगीत एवं काव्य द्धारा प्रचार)
२/२१ व्यायाम एक अनिवार्य आवश्यकता (व्यायामशाला)
२/२२ जगह जगह व्यायामशालायें स्थापित की जायें (पी.टी.का द्दश्य)
२/२३ शस्त्र संचालन के दोहरे लाभ (लाठी संचालन)
२/२४ खेल कूदों की गतिविधियाँ तीव्र की जायें (कबड्डी व बालीबाल)
२/२५ रचनात्मक कार्यो में योगवान करें (युग सनानियों द्धारा रचनात्मक कार्य)
२/२६ बोलती दीवारों का आन्दोलन (बोलती दीवारे)
२/२७ शिक्षामें उधोग प्रशिक्षण का समन्वय (युग निर्माण विधालय)
२/२८ हर जगह कुटीर उधोगो का प्रचलन किया जाय (घरेलू उधोग धन्धे)
२/२९ हरित क्रान्ति को देश व्यापी बनायें
२/३० खाध समस्या का हल शाक सब्जी बोये (शाक वाटिका)
२/३१ साधु ब्राह्म अपना उतरदायित्व निभायें (सप्त ऋषि तथा भिखमंगे)
२/३२ निरंकुश राजनीति पर धर्म तन्त्र का नियम्त्रण (ब्रह्मर्षि वशिष्ठ,चाणक्य)
२/३३ वोट हर किसी को न दें )सेवा कर्तव्य निष्ठा आदि के साइन बोर्ड)
२/३४ संतान की सीमा मर्यादा (एक छोटा परिवार)
२/३५ वानप्रस्थ का पुर्नप्रचलन (ध्यानस्थ छ: साधक)
२/३६ सामर्थ्य हीनों की अपराजेय संगठन शक्ति (राम-लक्ष्मण तथा जाम्बवन्त और हनुमान)
२/३७ रचनात्मक कामों में असमर्थ भी सहयोगी (गिलहरी को थपथपाते हुई राम)
२/३८ कठिनाइयाँ व्यक्ति के साहस की परीक्षा (स्वामी शंकराचार्य और वैध)
३/३९ देश जाति के बन्धनों से परे सेवा भावना (स्वामी विवेकानन्द को पुष्प अर्पण)
२/४० अभिनव सरचना की ऊषा (नदी व सूर्यास्त का द्दश्य)
३/१ जीवन का सदुपयोग ज्ञान से ही संम्भव (हाथ कुल्हाड़ा लिए किसान व महात्मा)
३/२ तृष्णा वासना का अभियान (दो राक्षसी एक आदमी)
३/३ निर्मल हदय ही आत्म सुख का पात्र (भगवान बुद्ध का भिक्षाटन)
३/४ निर्विकार मन ही परमार्थ का सच्चाँ पथिक (पहाडी रास्ते पर जाते हुए दो पथिक)
३/५ अधिकार नहीं कर्तव्य (राजय सता को ठुकराते हुए श्रीराम व भरत)
३/६ अर्जुन की सिद्धान्त निष्ठा (अर्जुन और उर्वशी)
३/७ छत्रपति का उत्कृष्ट द्दष्टिकोण (छत्रपति शिवाजी और यवन महिला)
३/८ प्रेम की सही परिभाषा (नृत्यु करती हुई वेश्या)
३/९ पूजा उपकरणों का सांकेतिक शिक्षण (बंशी बजाते श्री कृष्ण)
३/१० देव प्रतिमाओं में निहित शिक्षा (भगवान शंकर)
३/११ ईश्वर की पूजा ही नहीं सेवा भी (बाग में काम करता हुआ माली)
३/१२ विराट रुप परमात्मा की आराधना (भगवान का विराट रुप)
३/१३ प्राणिमात्र में भागवत चेतना का सच्चा दर्शन (गधे को पानी पिलाते हुए एकनाथ)
३/१४ सेवा साधना के सुख की श्रेष्ठता (स्वर्ग का निषेध करते हुए महर्षि यमाचार्य)
३/१५ विभूतियाँ लोक हित के लिए ही प्रयुक्त हो (फौजी अफसर व नोट गिनता हुआ व्यक्ति
३/१६ देने की वृति से पर्म सुख (भालू और शीकारी)
३/१७ कर्मफल का परिणाम निश्चित है (युद्ध करते हुए बालि और सुग्रीव)
३/१८ आस्तिकता का सच्चा स्वरुप (भागता हुआ चोर)
३/१९ भगवान का नाम ही नहीं काम भी (सर कटा हुआ आदमी)
३/२० द्धिजत्व का प्रतीक चिन्ह यज्ञोपवीत (यज्ञोपवीत पहने हुए एक पुरुष)
३/२१ मानसिक सन्तुलन और अनीति का विरोध (रथारुढ़ कृष्ण और अर्जुन)
३/२२ ऊचे लक्ष्य के लिए घोर श्रम (भागीरथ गगा व भगवान शंकर)
३/२३ विवाह का लक्ष्य और प्रयोजनो (वर माला पहनाते हुए सुकन्या)
३/२४ शवरी की सार्थक भक्ति साधना (शबरी द्धारा राम का आतिथ्य सत्कार)
३/२५ सम्पति का सदुपयोग (श्री कृष्ण द्धारा सुदामा के पेर धोना)
३/२६ सच्चा सहचरत्व और कर्तव्य प्रेरणा (विवाह राम और सीता तथा उर्मिला और लक्ष्मण)
३/२७ परशुराम की ज्ञान क्रान्ति (परशु लिये परशुराम)
३/२८ वैभव वृति नहीं सेवा और त्याग (हल चलाते हुए राजा जनक)
३/२९ कर की चोरी और कर्तव्य की उपेक्षा नहीं (शमशान में महाराज हरिश्चन्द्र व शैव्या)
३/३० विरक्त,कर्तव्यनिष्ठ स्वामी रामदास (माँ दुर्गा,का शिवाजी को तलवार देना)
३/३१ विश्वास की रक्षा परम धर्म (हत्या करते हुए बनवीर)
३/३२ बा और बापू का आदर्श (बैठे हुए बापू और बा)
३/३३ नीति से ही अनीति को पराजित किया जा सकता है (ऋषि दधिचि और करबद्ध इन्द्र)
३/३४ परमार्थ निष्ठा से असंख्य लोगों में जीवन संचार (ध्यानस्थ पूज्य गुरुदेव)
३/३५ गायत्री तपोभूमी से संचालित युग निर्माण अभियान (गायत्री तपोभूमि का भवन)
३/३६ शिखा भारतीय संस्कृति की धर्म ध्वजा (शिखा बाँधते हुए साधक)
३/३७ गायत्री मंत्र सद्ज्ञान का प्रतीक है (गायत्री मन्त्र)
३/३८ नव निर्माण के लिए वाणी का उपयोग (युग निर्माण सम्मेअलन का द्दश्य)
३/३९ समता,शूचिता,एकता और ममता का कल्प वृक्ष (चार शाखाओं का वृक्ष)
३/४० सार्वभ्ॐइक एकता की ओर (तालाब में खिलते हुए चार कमल)
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