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आत्म चेतना की विलक्षण आकृतियाँ-प्रकृतियाँ
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AJH1970Nov_17
#आत्म
#आकृति
#प्रकृति
आत्म चेतना की विलक्षण आकृतियाँ-प्रकृतियाँ Document
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Topic Of Source Title
आगामी २०० दिन जिसमें २० वर्ष का काम निपटाना है_AJH1970Nov
दुःख की निवृत्ति ज्ञान से ही सम्भव
प्रेम जगत का सार और कुछ सार नहीं
प्रेम की आश, प्रेम की प्यास पशु-पक्षियों के भी पास
यह रही सच्ची भावना की शक्ति- सामर्थ्य
अपूर्णता से पूर्णता की ओर
विभूतियाँ कुपात्र को नहीं-सुपात्र को
हम आसुरी वृत्तियों को नहीं देव वृत्तियों को अपनायें।
पवित्रीकरण- प्रकृति की आद्य-प्रक्रिया
आत्मा-शरीर नहीं, शाश्वत और स्वतंत्र द्रव्य
जितना सूक्ष्म स्वत्व-उतना अधिक महत्व
शरीर का मूल्य केवल सत्ताईस रुपये?
जिज्ञासा और धैर्य में आत्मज्ञान की पात्रता सन्निहित
आत्म-सुधार विश्व-कल्याण का सबसे सरल मार्ग
खेती करिये हवा में- मन भावे सो खाइये
वर्तमान की मुट्ठी में भूत और भविष्य-दर्शन
अचेतन कुछ भी नहीं-जड़ भी चेतन
आत्म चेतना की विलक्षण आकृतियाँ-प्रकृतियाँ
जर्रा-जर्रा बोल रहा है- ‘जियो और जीने दो’
सत्य को सर्वोपरि मानने वाला सत्यकाम
निरहंकारी ही पापों से बच सकता है?
वैज्ञानिक कसौटी पर फेल-आधुनिक फैशन
संयुक्त राष्ट्र संघ से संयुक्त ग्रह राज्य की ओर
एक भाई की खोज
चक्कर, चौरासी लाख योनियों का
हृदय-परिवर्तन
कामवासना का अधिकतम १। २३वाँ हिस्सा
इस वर्ष के गायत्री यज्ञों एवं युग-निर्माण सम्मेलनों के कार्यक्रम
अपनों से अपनी बात-आगामी २०० दिन जिसमें २० वर्ष का काम निपटाना है (लेख शृंखला)
जिसने मन को जीत लिया (कविता)
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