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ऋषि चिंतन के सान्निध्य में भाग २

ऋषि चिंतन के सान्निध्य में भाग २

Author: Pt. Shriram Sharma Achary & Mata Bhagavati Devi Sharma Publisher: Yug Nirman Yojana, Mathura Code: HINB0130 51461 Views In Stock (2)
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आत्मनिवेदन
अंतिम संदेश
युगऋषि परम पूज्य पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अंतिम संदेश
वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा
गायत्री का दर्शन
देवसंस्कृति की माता गायत्री
गायत्री महामंत्र की विलक्षण शक्ति
देव संस्कृति का दर्शन गायत्री मंत्र
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
बुझा सकेगी इसे न झंझा
ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल
युगऋषि की जन्मभूमि-युगतीर्थ आँवलखेड़ा
अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
युगऋषि की कर्मभूमि तपोभूमि मथुरा
गायत्री तेर्थ शांतुकुंज हरिद्धार
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्धार
देव संस्कृति विश्वविधालय हरिद्धार
हमारा युग निर्माण सत्संकल्प
आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है
मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिए
इच्छाशक्ति के चमत्कार
युग निर्माण आंदोलन और उसका प्रयोजनो
युग निर्माण आंदोलन का प्रयोजनो
प्रतिकूलताओं की चुनौती स्वीकार कीजिए
प्रगति पथ के तीन प्रमुख अवरोध
मानव जीवन का अनुपम सौभाग्य
जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ
इस विषम वेला में हमारा महान उतरदायित्व
हम तुच्छ नहीं गौरवास्पद जीवन जिएँ
आचरण में श्रेष्ठता का समावेश
श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है
सर्वोत्कृष्ट परमार्थ ज्ञानयज्ञ
स्वार्थ ही न सोचते रहे परमार्थ का भी ध्यान रखें
आत्मा को देखें,खोजें और समझें
सच्ची व चिरस्थायी प्रगति के दो अवलंबन
महान अवलंबन का परित्याग न करें
व्यष्टि का समष्टि में विसर्जन
ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है
कामनाओं को नियंत्रित और मर्यादित रखें
परमात्मसता से संबद्ध होने का माध्यम
आत्मिक प्रगति सद्‌ज्ञान पर निर्भर
मनुष्य अनंत शक्ति का भंडार है
अनंत आनंद का स्त्रोत आध्यात्मिक जीवन
प्रसन्न यों रहा का सकता है
परहित सरिस धर्म नहिं भाई
ज्ञान और श्रम का संयोग आवश्यक
जीवन की महता समझें और उसका सदुपयोग करें
समस्त शक्तियों का भंडार एकाग्र मन
आत्मत्याग ही सर्वोच्च धर्म
सबसे बड़ी सेवा
द्रृष्टिकोण के अनुरुप संसार का स्वरुप
हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं
पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी
मन को दुर्बल न बनने दें
प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी
मन को जीतना सबसे बड़ी विजय
मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
सद्‌विचार अपनाए बिना कल्याण नहीं
विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
हमारी महत्वाकांक्षाएँ निकृष्ट न हों
निराशा का अभिशाप परिताप
कर्म ही ईश्वर उपासना
हमारे अधिक विरोधी क्यों बनते हैं
निकृष्टरा नहीण उत्कृष्टता ही हमें प्रभावित करे
सार्वभ्ॐइक उपासना
आलस त्यागें सुसंपन्न बनें
ढलती आयु का उपयोग इस तरह करें
आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिएँ
मनोविकार हमारे सबसे बड़े शत्रु
प्रार्थना आत्मा का संबल
शरीर का ही नहीं आत्मा का भी ध्यान रखें
धर्म एक महासागर
मस्तिषक उद्धेगग्रस्त न होने दें
जीवन का अभिप्राय दिव्य प्रेम
अपने सौभाग्य को सराहते रहें
जीवन का अर्थ
आत्मविश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य
भक्ति ज्ञान और विज्ञान की साधना त्रिवेणी
जिसे जीना आता है वह सच्चा कलाकार है
विधा ही तो सफलता का मूल आधार है
हमारी इच्छाशक्ति प्रबल एवं प्रखर हो
कर्मों की खेती
अहंकार के सर्प दंश से सदा बचे रहिए
दु:ख की निवृति ज्ञान से ही संभव
हम आसुरी वृतियों को नहीं दैवी वृतियों को अपनाएँ
बलमुपास्व बल की उपासना करो
क्षुदं हदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परंतप
जमाने के साथ बदलिए
जो निरंतर देता है वह निर्बाध पाता है
भगवान को बार बार याद करो
हम निकृष्ट स्तर का जीवन न जिएँ
सच्चे सौंदर्य की खोज और साक्षात्कार
मैं और मेरा नहीं हम और हमारा
जीवन का कुछ उद्‌देश्य भी तो हो
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है
उतम ज्ञान जाग्रत देवता
परमात्मा को भूलो मत
आत्मपरिष्कार से परब्रह्म की प्राप्ति
महाशून्य की यात्रा
बनाने की सोचिए,बिगाड़ने की नहीं
प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता
हमारी प्रार्थना कैसी हो
आत्मिक प्रगति का आधार संवेदना सहानुभूति
संकीर्णता के सीमा बंधन से छुटकारा पाएँ
अपने दोषों को स्वीकारें और सुधारें
कर्मकांड से ईश्वर को न फुसलाएँ
सत्य तप और वैराग्य का समन्वय
उपासना की सफलता साधना पर निर्भर है
अपने को पहचानें आत्मबल संपादित करें
जीवन की मूल प्रेरणा कर्तव्यपालन
समस्त सफलताओं का हेतु मन
हम अपने को प्यार करें ताकि ईश्वर का प्यार पा सकें
ईश्वर की प्राप्ति सरलतम भी कठिनतम भी
गुरु से काम नहीं चलेगा सद्‌गुरु की शरण में जाएँ
न किसी को कैद करें और न कैदी बनें
उसे अवश्य पा लोगे
आत्मविश्वासी पर,दूसरे भी विश्वास करते हैं
अंत : करण में ईश्वर का दर्शन
हम ईश्वर के होकर रहें उसी के लिए जिएँ
ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया हाए
आत्मदेव की उपासना
जीवन का अर्थ
दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृतियों से छुटना ही मुक्ति है
जिंदगी जीनी हो तो इस तरह जिएँ
हम सज्जनता अपनाएँ सगदय बनें
कर्मयोग,ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना
पात्रता प्रमाणित करें,विभूतियों का वरदान पाएँ
विवेकयुक्त दूरदर्शी बुद्धिमता ही श्रेयस्कर है
न तो हिम्मत हारें न हार स्वीकार करें
बाहरी संपदा आंतरिक समृद्धि की छाया मात्र है
चतुराई नहीं सज्जनता और सरलता अपनाएँ
परिष्कृत द्रृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है
सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है
विधेयात्मक चिंतन से मानसिक संतुलन ठीक रखें
जीवन का मूल्य समझें और उसे सार्थक बनाएँ
व्रतशील जीवन की गरिमा
जो ईश्वर से डरेगा उसे और किसी से नहीं डरना है
गलोगे तो ही उगोगे
ईश्वर अपने बताए नियमों मर्यादाओं में बँधा है
यथार्थवादी बनेण संकल्पबल प्रखर करें
निरंकुश बुद्धिवाद हमारा सर्वनाश करके ही छोड़ेगा
ध्यानयोग चरम आत्मोत्कर्ष की साधना
उपलब्धियों का सदुपयोग करना सीखें
सौभाग्य भरे क्षणों तिरस्कृत न करें
भीतर का खोखलापन और सड़ी जड़ें
यथार्थता को समझें आग्रह न थोपें
बिभूतिरसित संपदा निरर्थक है
वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बने रहें
आत्मविश्वास ईश्वर का अजस्त्र वरदान
अंतर का परिष्कार सफल जीवन का आधार
देने वाला घाटे में नहीं रहता
हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं
दुर्बलताओं को खोजें और उखाड़ फेंकें
ईश्वर की समीपता और दूरी की परख
अंधकार का निराकरण आदर्शवादी व्यक्तित्व ही करेंगे
भगवान का पुत्र क्रूसारोही मानव
सद्‌ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य का श्रेष्ठतम सौभाग्य
अनंत संभावनाओं से युक्त मानवी सता
क्रिया का स्वरुप नहीं उद्‌देश्य देखा जाए
भ्रमजाल से छुटॆं मायामुक्त हों
सफलता प्राप्त करने के लिए अभीष्ट योग्यता संपादित करें
निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें
दु:ख और सुख मिल बाँटकर हलके करें
हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें
अपने पर भरोसो करें कि आप समर्थ हैं
असफलता हमें हताश न कर पाए
द्रृष्टिकोण बदलें,सब कुछ बदलेगा
सफल जीवन की सरल रीति नीति
सत्य को ही अपनाएँ-असत्य को नहीं
प्रबल पुरुषार्थ से प्रतिकूलता भी अनुकूलता बनती है
ईश्वर का अस्तित्व असिद्धि नहीं है
हम सुसंस्कृत बनें,संस्कारवान बनें
दूसरों के गुण और अपने दोष देखें
व्यक्तिवाद नहीं,समाजवाद हमारा लक्ष्य हो
द्रृढ़ इच्छाशक्ति एक चमत्कारी उपलब्धि
आत्मतत्व की अखंडता
जीवन संपदा का सदुपयोग सीखा जाए
संघर्ष ही जीवन है
अपने को अधिकाधिक सुविस्तृत बनाते चलें
व्यक्ति का समाज के प्रति दायित्व
कर्म का प्रतिफल अकाट्‌य है
ईश्वर का द्धारा सबके लिए खुला है
श्रम देवता की साधना
उदार जीवन यात्रा
विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया
अपने को पहचानें और विकसित करें
दु:ख और सुख सहोदर सहचर
आत्मीयता का विस्तार
आत्मजागरण के लिए ध्यानयोग की आवश्यकता
ध्यानयोग से एकाग्रता की दिव्यशक्ति का उद्‌भव
साधना से सिद्धि की प्राप्ति
सौंदर्य और शक्ति का स्त्रोत अंतस्‌ में
आत्मनिर्भर बनें अपने आप उठें
संपति ही नहीं,सदाशयता भी
धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा
विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महँके
अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें
यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रह ही प्रधान बाधा
Book Size Big
Pages 224
Publisher Yug Nirman Yojana, Mathura
Publication Year 2013
Format 19x25 CM
Weight 0.86
Code H_SJ_73

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