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द्रृष्टिकोण बदलें,सब कुछ बदलेगा
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Author:
Pt. Shriram Sharma Acharya
Code:
HINB0130_160
Source:
ऋषि चिंतन के सान्निध्य में भाग २ (Book)
#द्रृष्टिकोण
#बदलें
#सब
#कुछ
#बदलेगा
#
द्रृष्टिकोण बदलें,सब कुछ बदलेगा Document
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Topic Of Source Title
आत्मनिवेदन
अंतिम संदेश
युगऋषि परम पूज्य पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अंतिम संदेश
वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा
गायत्री का दर्शन
देवसंस्कृति की माता गायत्री
गायत्री महामंत्र की विलक्षण शक्ति
देव संस्कृति का दर्शन गायत्री मंत्र
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा
बुझा सकेगी इसे न झंझा
ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल
युगऋषि की जन्मभूमि-युगतीर्थ आँवलखेड़ा
अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
युगऋषि की कर्मभूमि तपोभूमि मथुरा
गायत्री तेर्थ शांतुकुंज हरिद्धार
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्धार
देव संस्कृति विश्वविधालय हरिद्धार
हमारा युग निर्माण सत्संकल्प
आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है
मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिए
इच्छाशक्ति के चमत्कार
युग निर्माण आंदोलन और उसका प्रयोजनो
युग निर्माण आंदोलन का प्रयोजनो
प्रतिकूलताओं की चुनौती स्वीकार कीजिए
प्रगति पथ के तीन प्रमुख अवरोध
मानव जीवन का अनुपम सौभाग्य
जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ
इस विषम वेला में हमारा महान उतरदायित्व
हम तुच्छ नहीं गौरवास्पद जीवन जिएँ
आचरण में श्रेष्ठता का समावेश
श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है
सर्वोत्कृष्ट परमार्थ ज्ञानयज्ञ
स्वार्थ ही न सोचते रहे परमार्थ का भी ध्यान रखें
आत्मा को देखें,खोजें और समझें
सच्ची व चिरस्थायी प्रगति के दो अवलंबन
महान अवलंबन का परित्याग न करें
व्यष्टि का समष्टि में विसर्जन
ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है
कामनाओं को नियंत्रित और मर्यादित रखें
परमात्मसता से संबद्ध होने का माध्यम
आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर
मनुष्य अनंत शक्ति का भंडार है
अनंत आनंद का स्त्रोत आध्यात्मिक जीवन
प्रसन्न यों रहा का सकता है
परहित सरिस धर्म नहिं भाई
ज्ञान और श्रम का संयोग आवश्यक
जीवन की महता समझें और उसका सदुपयोग करें
समस्त शक्तियों का भंडार एकाग्र मन
आत्मत्याग ही सर्वोच्च धर्म
सबसे बड़ी सेवा
द्रृष्टिकोण के अनुरुप संसार का स्वरुप
हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं
पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी
मन को दुर्बल न बनने दें
प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी
मन को जीतना सबसे बड़ी विजय
मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
सद्विचार अपनाए बिना कल्याण नहीं
विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
हमारी महत्वाकांक्षाएँ निकृष्ट न हों
निराशा का अभिशाप परिताप
कर्म ही ईश्वर उपासना
हमारे अधिक विरोधी क्यों बनते हैं
निकृष्टरा नहीण उत्कृष्टता ही हमें प्रभावित करे
सार्वभ्ॐइक उपासना
आलस त्यागें सुसंपन्न बनें
ढलती आयु का उपयोग इस तरह करें
आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिएँ
मनोविकार हमारे सबसे बड़े शत्रु
प्रार्थना आत्मा का संबल
शरीर का ही नहीं आत्मा का भी ध्यान रखें
धर्म एक महासागर
मस्तिषक उद्धेगग्रस्त न होने दें
जीवन का अभिप्राय दिव्य प्रेम
अपने सौभाग्य को सराहते रहें
जीवन का अर्थ
आत्मविश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य
भक्ति ज्ञान और विज्ञान की साधना त्रिवेणी
जिसे जीना आता है वह सच्चा कलाकार है
विधा ही तो सफलता का मूल आधार है
हमारी इच्छाशक्ति प्रबल एवं प्रखर हो
कर्मों की खेती
अहंकार के सर्प दंश से सदा बचे रहिए
दु:ख की निवृति ज्ञान से ही संभव
हम आसुरी वृतियों को नहीं दैवी वृतियों को अपनाएँ
बलमुपास्व बल की उपासना करो
क्षुदं हदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परंतप
जमाने के साथ बदलिए
जो निरंतर देता है वह निर्बाध पाता है
भगवान को बार बार याद करो
हम निकृष्ट स्तर का जीवन न जिएँ
सच्चे सौंदर्य की खोज और साक्षात्कार
मैं और मेरा नहीं हम और हमारा
जीवन का कुछ उद्देश्य भी तो हो
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है
उतम ज्ञान जाग्रत देवता
परमात्मा को भूलो मत
आत्मपरिष्कार से परब्रह्म की प्राप्ति
महाशून्य की यात्रा
बनाने की सोचिए,बिगाड़ने की नहीं
प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता
हमारी प्रार्थना कैसी हो
आत्मिक प्रगति का आधार संवेदना सहानुभूति
संकीर्णता के सीमा बंधन से छुटकारा पाएँ
अपने दोषों को स्वीकारें और सुधारें
कर्मकांड से ईश्वर को न फुसलाएँ
सत्य तप और वैराग्य का समन्वय
उपासना की सफलता साधना पर निर्भर है
अपने को पहचानें आत्मबल संपादित करें
जीवन की मूल प्रेरणा कर्तव्यपालन
समस्त सफलताओं का हेतु मन
हम अपने को प्यार करें ताकि ईश्वर का प्यार पा सकें
ईश्वर की प्राप्ति सरलतम भी कठिनतम भी
गुरु से काम नहीं चलेगा सद्गुरु की शरण में जाएँ
न किसी को कैद करें और न कैदी बनें
उसे अवश्य पा लोगे
आत्मविश्वासी पर,दूसरे भी विश्वास करते हैं
अंत : करण में ईश्वर का दर्शन
हम ईश्वर के होकर रहें उसी के लिए जिएँ
ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया हाए
आत्मदेव की उपासना
जीवन का अर्थ
दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृतियों से छुटना ही मुक्ति है
जिंदगी जीनी हो तो इस तरह जिएँ
हम सज्जनता अपनाएँ सगदय बनें
कर्मयोग,ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना
पात्रता प्रमाणित करें,विभूतियों का वरदान पाएँ
विवेकयुक्त दूरदर्शी बुद्धिमता ही श्रेयस्कर है
न तो हिम्मत हारें न हार स्वीकार करें
बाहरी संपदा आंतरिक समृद्धि की छाया मात्र है
चतुराई नहीं सज्जनता और सरलता अपनाएँ
परिष्कृत द्रृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है
सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है
विधेयात्मक चिंतन से मानसिक संतुलन ठीक रखें
जीवन का मूल्य समझें और उसे सार्थक बनाएँ
व्रतशील जीवन की गरिमा
जो ईश्वर से डरेगा उसे और किसी से नहीं डरना है
गलोगे तो ही उगोगे
ईश्वर अपने बताए नियमों मर्यादाओं में बँधा है
यथार्थवादी बनेण संकल्पबल प्रखर करें
निरंकुश बुद्धिवाद हमारा सर्वनाश करके ही छोड़ेगा
ध्यानयोग चरम आत्मोत्कर्ष की साधना
उपलब्धियों का सदुपयोग करना सीखें
सौभाग्य भरे क्षणों तिरस्कृत न करें
भीतर का खोखलापन और सड़ी जड़ें
यथार्थता को समझें आग्रह न थोपें
बिभूतिरसित संपदा निरर्थक है
वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बने रहें
आत्मविश्वास ईश्वर का अजस्त्र वरदान
अंतर का परिष्कार सफल जीवन का आधार
देने वाला घाटे में नहीं रहता
हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं
दुर्बलताओं को खोजें और उखाड़ फेंकें
ईश्वर की समीपता और दूरी की परख
अंधकार का निराकरण आदर्शवादी व्यक्तित्व ही करेंगे
भगवान का पुत्र क्रूसारोही मानव
सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य का श्रेष्ठतम सौभाग्य
अनंत संभावनाओं से युक्त मानवी सता
क्रिया का स्वरुप नहीं उद्देश्य देखा जाए
भ्रमजाल से छुटॆं मायामुक्त हों
सफलता प्राप्त करने के लिए अभीष्ट योग्यता संपादित करें
निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें
दु:ख और सुख मिल बाँटकर हलके करें
हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें
अपने पर भरोसो करें कि आप समर्थ हैं
असफलता हमें हताश न कर पाए
द्रृष्टिकोण बदलें,सब कुछ बदलेगा
सफल जीवन की सरल रीति नीति
सत्य को ही अपनाएँ-असत्य को नहीं
प्रबल पुरुषार्थ से प्रतिकूलता भी अनुकूलता बनती है
ईश्वर का अस्तित्व असिद्धि नहीं है
हम सुसंस्कृत बनें,संस्कारवान बनें
दूसरों के गुण और अपने दोष देखें
व्यक्तिवाद नहीं,समाजवाद हमारा लक्ष्य हो
द्रृढ़ इच्छाशक्ति एक चमत्कारी उपलब्धि
आत्मतत्व की अखंडता
जीवन संपदा का सदुपयोग सीखा जाए
संघर्ष ही जीवन है
अपने को अधिकाधिक सुविस्तृत बनाते चलें
व्यक्ति का समाज के प्रति दायित्व
कर्म का प्रतिफल अकाट्य है
ईश्वर का द्धारा सबके लिए खुला है
श्रम देवता की साधना
उदार जीवन यात्रा
विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया
अपने को पहचानें और विकसित करें
दु:ख और सुख सहोदर सहचर
आत्मीयता का विस्तार
आत्मजागरण के लिए ध्यानयोग की आवश्यकता
ध्यानयोग से एकाग्रता की दिव्यशक्ति का उद्भव
साधना से सिद्धि की प्राप्ति
सौंदर्य और शक्ति का स्त्रोत अंतस् में
आत्मनिर्भर बनें अपने आप उठें
संपति ही नहीं,सदाशयता भी
धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा
विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महँके
अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें
यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रह ही प्रधान बाधा
कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं
हम चिंतन की द्रृष्टि से भी प्रौढ़ बनें
क्षुद्रता अपनाने से मात्र हानि ही हानि है
अंतर की गहराई में उतरें
अभीष्ट की उपलब्धि भीतर से ही होगी
प्राणशक्ति एक जीवंत ऊर्जा
सर्वतोमुखी प्रगति के दो आधार अध्यात्म और विज्ञान
वर्चस की साधना आत्मबल उभारने के लिए
साधना पथ और अनंत ऐश्वर्य
जीवन और उसकी परिभाषा
विचारों में क्रम-व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाए रहें
दिशा निर्धारण मनुष्य का अपना निर्णय
तनाव और उससे छुटकारा
उपार्जन का सदुपयोग भी
आनंद अपनी ही मुट्ठी में भरा पड़ा है
जीवन ईश्वर का स्वरुप एवं वरदान
सादगी अपनाएँ शालीनता बरतें
वरदानी शक्ति का देवता सुद्रृढ़ संकल्प
देवता कौन हैं
मनोनिग्रह के लिए उपासना की आवश्यकता
संकल्प और आत्मबल एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं
मित्रता और उसका निर्वाह
पवित्रता,महानता और संयमशीलता
आस्था ही आस्तिकता
साधना और सिद्धि का सिद्धांत
पैरों को तोड़ें नहीं प्रगति की सहज यात्रा पर बढ़ने दें
मुस्कान सुसंस्कृत व्यक्तित्व की निशानी
आत्मदेव की साधना और सिद्धि
जीवन के स्वरुप और उद्देश्य को समझो
अपना मूल्यांकन वास्तविकता से अधिक न करें
द्रृश्य नहीं,दर्शक बनें
परमात्मा का अस्तित्व और अनुग्रह
संपदाएँ नहीं विभूतियाँ
स्त्रोत अंदर है,बाहर नहीं
जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में तीन प्रमुख व्यवधान
प्रार्थना अर्थात विनम्र पुरुषार्थ
दूरदर्शिता का दोहरा लाभ
कर्म ही सर्वोपरि
आज मिल पाया नहीं,तो कल मिलेगा
जीवन साधना की सिद्धि के रहस्य
परिवर्तन में प्रगति और जीवन
प्रगति तो हो,पर उत्कृष्टता की दिशा में
अक्लमंदी नहीं,बुद्धिमता अपनाएँ
सत् को समझें,सत् को पकड़े
तीन असाधारण सौभाग्य
सफलता का मूलभूत आधार आकांक्षा
परिष्कृत जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
साधना से सिद्धि और मार्ग के अवरोध
कठिनाइयों का स्वागत कीजिए
लक्ष्य की दिशा में अनवरत यात्रा
उतरदायित्वों को निभाएँ,महान बनें
अशुभ चिंतन छोड़िए भयमुक्त होइए
बुद्धि की प्रखरता ही नहीं,भावनाओं की उदारता भी
करुणा में भगवान
आदर्शवादी महत्वाकांक्षाओं के फलितार्थ
संस्कृति और सभ्यता
उत्थान पतन का आधार,आकांक्षाओं का परिष्कार
नर-पशु नारायण में प्रत्यावर्तन आत्मिकी का अवलंबन
उपलब्ध संपदा का सदुपयोग हो
अध्यात्म का लक्ष्य मात्र आत्मकल्याण
उठो जागो और विकास करो
ज्ञान की महता कर्म के साथ ही
अनेकता से एकता की ओर महायात्रा
जानना तो अपने को भी चाहिए
सृजन चेतना की समर्थता और गरिमा
वैभव ही नहीं,विवेक भी
विचार एक अद्भुत प्रचंड शक्ति स्त्रोत
शाश्वत जीवन को सुसंपन्न बनाना श्रेयस्कर है
हम अपनी ही प्रतिध्वनि सुनते और प्रतिच्छाय देखते हैं
व्यवहार में औचित्य का समावेश
कठिनाइयाँ आवश्यक हैं,लाभदायक भी
निंदा से विचलित न हों,उसे महत्व न दें
परिवर्तन प्रगति की पहली सीढ़ी
अध्यात्म क्षेत्र की सफलता का सुनिश्चित मार्ग
समष्टि की साधना का तत्वदर्शन
परिशोधन प्रगति का प्रथम चरण
जीवन बहुमूल्य है,इसे व्यर्थ न गँवाएँ
द्रृश्य से परे विचारों की विलक्षण दुनिया
विस्मृति की मूर्च्छना
मन को सुधारा सधाया जा सकता है
बुद्धिमता सर्वोपरि संपदा
परमात्मा की आनंदमयी सता
संपदा को रोकें नहीं
भक्त के लिए ईश्वर का उपहार
याचना नहीं प्रार्थना
खाली हूजिए आप लबाबल भर जाएँगे
आत्मा और परमात्मा की एकता
दूरदर्शिता-एक बहुत बड़ा सौभाग्य
विधाता के बहुमूल्य उपहार
मानवी क्षमता का कोई पारावार नहीं
आत्मा की आवाज
वैभव की कमी नहीं,पर आवश्यकता जितना ही समेंटें
प्रतिभा जागरुकता और तत्परता की परिणति
आँगन में विधान कल्पवृक्ष
विचारणा की पारसमणि
मन को कुसंस्कारी न रहने दिया जाए
तत्वज्ञान और सेवा साधन
जो दीपक की तरह जलने को तैयार हों
जीवन कलाकार हाथों से सँजोया जाय
बड़प्पन की सही कसौटी
समग्र श्रेष्ठता विकसित करें
शरीर की रुग्णता में मनोविकार प्रधान कारण
सर्वश्रेष्ठ कलाकारिता
मन्युरसि मन्युमयि देहि
आत्मविजेता ही विश्वविजेता
अंधकार को दीपक की चुनौती
गहरे उतरें,विभूतियाँ हस्तगत करें
सुरदुर्लभ मनुष्य जन्म की सार्थकता
मानव जीवन की विशिष्टता एवं सार्थकता
समर्थता का सदुपयोग
आत्मैवेदं सर्वम्
ईश्वर का दर्शन पवित्र अंत:करण में
वर्तमान का सदुपयोग उज्जवल भविष्य का निर्माण
संपति बनाम सदाशयता
सच्चा मानवोचित पुरुषार्थ
समर्थ का आश्रम लें
अनंतपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष शता वहा
विचारणा का उच्चस्तरीय प्रवाह
उत्कर्ष का राजमार्ग
विचारों की असाधारण सामर्थ्य और परिणति
प्रतिकूलता कभी बाधक नहीं बनतीं
का वा विमुक्तिर्विषये विरक्ति
मनुष्य अपना भविष्य अपने हाथ
द्रृष्टिकोण का सम्यक परिष्कार
समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुंजी
सद्बुद्धि की अवधारणा
निष्ठा आत्मशक्ति की निर्झरिणी
स्वच्छता एवं सुसंस्कारिता
प्रतिअकूलताओं मेंड़बड़ाएँ नहीं
ज्ञाम सबसे बड़ा देवता
मनुष्य भटका हुआ देवता
चिरस्थायी संपदा चरित्रनिष्ठा
सिद्धि का केंद्र अपना ही अंतराल
मेरा यहाँ कुछ नहीं सब कुछ तेरा है
भाग्य का निर्णय मनुष्य स्वयं करता है
जीवन साधना के कुछ सुनिश्चित सूत्र
जड़े गहरी और मजबूत हों
पगडंडियों में न भटकें
कामनाओं की नहीं संकल्पों की पूर्ति
है स्वर्ग यहीं अपवर्ग यहीं
ईश्वर उपासना से जुड़ी श्रेष्ठ भावनाएँ
उद्दंडता का उपचार विपति के रुप में
समर्पण का आनंद और उसकी अनुभूति
शक्ति का संचय भी अनिवार्य
कर्मों की फलती फूलती खेती
प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विधमान
प्रतिभा संवर्द्धन की दो महानतम उपलब्धियाँ
ईश्वर का दर्शन और संभाषण
चितंन की द्रृष्टि से हम प्रौढ़ बनें
प्रार्थना जीवन का अविच्छिन्न अंग बने
प्रतिकूलताएँ निखारती हैं,व्यक्तित्व को
प्रतिभाएँ यहा तथ्य समझें समझाएँ
प्रसन्नता एक सुलझी हुई मन:स्थिति
चिंतन की अनगढ़ता ही दरिद्रता है
क्षुद्रता अपनाने से हानि ही हानि
आत्मविश्वास एक जीवन मूरि
अपनी परिधि का विस्तार करें
जीवन देवता को कैसे साधें
इस दिव्य अनुदान को व्यर्थ न जाने दें
मात्र वर्तमान का ही विचार करें
हम में से कोई सचमुछ ही बुद्धिमान है क्या
आत्मविस्तार ही सर्वोच्च धर्म
विचारधरा का प्रगतिशील परिष्कार
क्या सुंदर क्या असुंदर
संग्रह से कलह और विग्रह ही हाथ लगेगा
मनस्वी तेजस्वी
बुद्धि नहीं,भावना प्रधान
स्वर्ग और नरक अपने ही हाथ में
अंत:करण की पुकार अनसुनी न करें
सद्ज्ञान वह जो सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे
उपलब्धियों का सदुपयोग ही सफलताओं का मूल
अतिवाद न बरता जाए
परिष्कृत द्रृष्टिकोण ही स्वर्ग है
अहिंसा के नूतन आयाम
धर्म का वास्तविक तात्पर्य
युग निर्माण योजना
आत्मीय पाठक बंधुओं से हमारा स्नेह भरा अनुरोध
ज्ञानयज्ञ की क्रांतिकारी योजनाएँ
श्रीराम झोला पुस्तकालय
माता भववती स्वचालित पुस्तकालय
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युग निर्माण विधा परिषद् (पत्राचार पाठ्यक्रम)
अपना मूल्यांकन भी करते रहें
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