युग गीता भाग  ४

युग गीता भाग ४

Author: Dr. Pranav Pandya Publisher: Shantikunj, Haridwar Code: HINR1649 5019 Views In Stock (4)
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Hindi
एकाकी यतचितात्मा निराशी अपरिग्रह (लेख)
ध्यान हेतु व्यावहारिक निर्देश देते एक कुशल शिक्षक (लेख)
सबसे बड़ा अनुदान परमानंद की पराकाष्ठा वाली दिव्य शांति (लेख)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मषु (लेख)
कैसा होना चाहिए योगी का संयत चित्त (लेख)
योग की चरमावस्था की ओर ले जाते योगेश्वर (लेख)
परमात्मारुपी लाभ को प्राप्त व्यक्ति दुख में विचलित नहीं होता (लेख)
बार-बार मन को परमात्मा मे ही निरुद्ध किया जाए (लेख)
चित्तवृत्ति निरोध एवं परमान्नद प्राप्ति का राजमाग (लेख)
ध्यान की पराकाष्ठा पर होती है सर्वोच्च अनुभूति (लेख)
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति (लेख)
सुख या दुख में सर्वत्र समत्व के दर्शन करता है योगी (लेख)
कैसे आए यह चंचल मन काबू में (लेख)
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते (लेख)
कल्याणकारी कार्य करने वाले साधक की कभी दुर्गति नहीं होती (लेख)
भविष्य में हमारी क्या गति होगी, हम स्वयं निर्धारित करते हैं (लेख)
योग पथ पर चलने वाले का सदा कल्याण ही कल्याण है (लेख)
तस्मात़् योगी भवार्जुन (लेख)
वही ध्यानयोगी है श्रेष्ठ जो प्रभु को समर्पित है (लेख)
Book Size Regular
Pages 190
Publisher Shantikunj, Haridwar
Publication Year 2011
Format 14.5x22 CM
Weight 0.3
Code H_SJ_54

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