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भाग्यवाद को तिलाँजलि देना ही श्रेयस्कर
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AJH1966Nov_10
#भाग्यवाद
#तिलाँजलि
#श्रेयस्कर
भाग्यवाद को तिलाँजलि देना ही श्रेयस्कर Document
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Topic Of Source Title
हम घट नहीं रहे—बढ़े ही हैं।_AJH1966Nov
हम वास्तविक बुद्धिमत्ता अपनायें
परमात्मा का अस्तिव और अनुग्रह
आत्म-सत्ता और उसकी महान् महत्ता
मन_बुद्धि_चित्त अहंकार का परिष्कार
ममता हटाने पर ही चित्त शुद्ध होगा
वासना-त्याग के बिना चैन कहाँ?
धनवान नहीं चरित्रवान होने की बात सोचिए
सद्ज्ञान का संचय एवं प्रसार आवश्यक है।
आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है।
भाग्यवाद को तिलाँजलि देना ही श्रेयस्कर
मनुष्यता को निर्दयता से कलंकित न करें
गौ-रक्षा मनुष्यमात्र का धर्म-कर्तव्य
परिवार किसी उद्देश्य के लिये बसाया जाय
समाज सुधार के लिए प्रबुद्ध वर्ग आगे बढ़े।
गायत्री की उच्चस्तरीय साघना-आत्म-कल्याण की सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि उपासना
अपनों से अपनी बात-हम घट नहीं रहे_बढ़े ही हैं। (लेख शृंखला)
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