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ईश्वर बोध की सर्व सुलभ साधना-प्रेम
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AJH1970Sep_3
#ईश्वर
#सुलभ
#साधना
ईश्वर बोध की सर्व सुलभ साधना-प्रेम Document
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Topic Of Source Title
हमारी श्रद्धा अब सक्रियता के रूप में बदले।_AJH1970Sep
कर्मों की खेती
अधूरी साधना-अपूर्ण फल
ईश्वर बोध की सर्व सुलभ साधना-प्रेम
रमणीक देह नगरी-एक देव उद्यान
हम अणु से ही उलझे न रहें ‘विभु बनें’
प्रपंच प्रेम नहीं- निःस्वार्थ प्रेम
अनासक्त कर्मयोग और उसका दर्शन
कुसंस्कार धोते चलें- अगला जन्म पछतावा न बने।
विस्तार की धुन में सिमट रही दुनिया
हड्डियाँ कमजोर करनी हों, तो माँस खाइए।
सिद्धि से श्रेष्ठ सन्निद्धि
कठिनाइयाँ हमारे व्यक्तित्व को प्रखर बनाती हैं।
जनसंख्या निरोध की निर्दय किन्तु प्राकृतिक प्रविधि
प्रकृति के अनोखे योगी
सन् २००० और उसके पूर्व के ३० वर्ष
मैत्रेयी- जिसने धन नहीं आत्म-कल्याण चाहा
सम्पूर्ण दृश्य प्रकृति सूर्य-प्रकाश की अनुकृति
वासनाओं के कुचक्र में आत्मबल का ह्रास
प्रकृति का निर्मम सत्य वीर भोग्या वसुन्धरा
एक अँग्रेज-आत्म तत्व की खोज में
“संस्कारात् द्विजोच्चते”
वायु - प्रदूषण से हमें यज्ञ बचायेंगे।
विज्ञान ने समस्याएं सुलझाईं कम, उलझाईं अधिक
सात लोक-जीवों की सात अवस्थाएं
अपनों से अपनी बात-हमारी श्रद्धा अब सक्रियता के रूप में बदले। (लेख शृंखला)
राजनीति पर धर्म की विजय
स्नेह-दीप धरना (कविता) (कविता)
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